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Monday, June 24, 2019

श्रद्धांजलि


A poem by Umesh chandra srivastava



श्रद्धांजलि सभा में जुटने वाले,
बड़ी निष्ठा से बोल रहे थे|
कि वह कितने- करीब थे उसके,
कितना चाहता था वह- उन्हें|
कितनी बेबाकी से लिखता था,
कबीरा के मंजर का दृष्टांत|
उनकी तमाम कवितायेँ,
मूर्तिभंजक, लोकरंजक,
और न जाने क्या क्या?
उनकी कविताओ में,
संघर्ष, वेदना और स्पृहाएं|
सब कुछ थी|
वह काल के गाल पर,
लिख देता था अटार|
टंकार कर कहता-
करो उसका प्रतिकार,
को हमे डूबोता हो,
समेटता हो|
उसे छोडो,
आगे बढ़ो|
विचारों की क्रांति का,
वह मशाल जलाओ|
जहाँ सारे मानक पुष्ट लगे |
तमान वैचारिक पड़तालों से,
नवाज़ा जा रहा वह|
आज स्मृति के झरोखों से,
निहार रहा था|
आये हुए लोगो की निष्ठां को,
खंगाल रहा था|
कि-कौन-क्या-क्या बहाना कर,
श्रधांजलि सभा से
खिसक रहे थे |
किसी ने किसी बैठक का,
तो किसी ने स्वाथ्य का,
रोना रोया|
और किसी ने कुछ कुछ और का|
अपने-अपने वक्तव्यों के बाद,
वह सब के सब,
फुर्र होते गये|
और अंत तक
श्रधांजलि सभा में,
पचास ये पांच ही रह गये|
जैसे लगा मुखाग्नि के बाद,
अपने ही सिर्फ दस-पंद्रह,
शेष रहते हैं|
बाकी सब वहा से,
 पलायन कर जातें हैं!
ठीक वही नज़ारा,
यहाँ भी था, यहाँ भी था, यहाँ भी था|
उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-
A poem by Umesh chandra srivastava


Sunday, June 23, 2019

मिट्टी-मिट्टी सोना उगले

A poem of Umesh chandra srivastava


मिट्टी-मिट्टी सोना उगले,
सोना-सोना मोती।
देश हमरा सर्वश्रेष्ठ है,
काहे को तू सोती।

सोना जीवन का वसूल नहीं,
जगना-जगना भाई।
जागोगे तब ही आगे हो,
बरसाओगे मोती।

अब तो भइया गजब ज़माना,
सत्ता खातिर होती।
लोगों को आपस में भिड़वाके ,
काट रहे हैं गोटी।

आओ देश सँवारे फिर से ,
कहाँ गयी क्यों सोती।
नारी धर्म निभाओ फिर से ,
देश  तुम्हीं से होती।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, June 22, 2019

जब मैं प्रेम में

A poem of  Umesh chandra srivastava

जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
तुम कैसे लगते हो।
कह नहीं सकता ,
बस जी करता ,
है कि तुम-
हममें समां जाओ
या फिर मैं-
तुममे समा जाऊं।
जब मैं प्रेम में
होता हूँ तो ,
लगता है
कि समय कैसे ,
बीत गया।
बेरहम समय ,
कितना क़साई है ,
कि मोहलत ही नहीं देता।
प्रेम तृप्ति हुई नहीं ,
कि समय बीत गया।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
समय को बहुत कोसता हूँ।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
अंदर का,
सारा श्रोता ,
स्रोत बन जाता है।
जब मैं  प्रेम में ,
होता हूँ तो




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of  Umesh chandra srivastava 

Wednesday, June 19, 2019

ऐसी कामना है खंजक

A poem of Umesh chandra srivastava


तुम विकट समय,
अवतरित हुए।
मूर्ति भंजक,
सबके रंजक।
तुम कहाँ गये ,
तुम हो तो बसे ,
सबके मन ह्रदय में-
कमल सदृश्य।
तुम राग-विराग में ,
चूर रहे।
पर लिखा-
बहुत ही दृढ होकर।
कबिरा की वाणी को गाया ,
उनकी वाणी को दोहराया।
गर्जन तेरा सब ,
अमर रहे ,
ऐसी कामना है खंजक।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

यह जो पेड़ कटे हैं

A poem of Umesh chandra srivastava

यह जो पेड़ कटे हैं
जड़े मुक्म्मल हैं |
दांव- पेच सारे चलेंगे,
लेकिन बात सुकम्मल है |
दो दरख्तों का दरकना,
अफसोस जनक है |
पर क्या किया जाए,
बिधना के आगे -
सारी बातें बेमानी है |




उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...