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Wednesday, November 28, 2018

हरिचरना

A poem of Umesh chandra srivastava

वह जो हरिचरना है ,
मोटा गया है।
खाते-खाते ,
सोटा गया है।

पहले पुरानी पार्टी में था ,
खूब जय बोला ।
लोटा भर-भर नहाया ,
न जाने अब ,
पता नहीं क्यों ?
नई आयी सत्ताधारी पार्टी का ,
कटोरा बन गया है।

हरिचरना की कोई ,
नीति-रीति स्पष्ट नहीं है।
जहां लोटा भरे ,
वही पोखरा चुन लेता है।
मरदजात  , कमबख्त-
अव्वल दर्जे का पैजामा है।

क्या किया जाए ,
अब तो हरिचरना जैसे बहुत हैं ! 
कहाँ-कहाँ डोल ,
थाली पीटा जाये ,
लोटा धारियों की जमात में।




 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, November 17, 2018

यही रंगशाला यही रंगभूमि -2

A poem of Umesh chandra srivastava 

बहुत रूप सागर के गागर में डूबे ,
ये रिश्ते तो एकदम समाये हुए हैं।
खिला गुल जो आंगन , उसी में हैं लिपटे ,
यह जंजाल सारे दिखाए हुए हैं।

मदों में हैं झूमे , सीना तान चलते ,
यह सारे ही रंग बनाये हुए हैं।
यहाँ कौन कैसे रहे , खुब सहे वह ,
सभी भूमिका तो लिखाये हुए हैं।

यहाँ तक कि बातों में माता-पिता को ,
ललन खुब अब तो छकाए हुए हैं।
यहाँ दुःख दलिद्दर सभी तो मिलेंगे ,
यह सारे मुखौटे लगाए हुए हैं।

किया तुमने क्या-क्या बताएंगे सबकुछ ,
यह तेरे जनाज़े में आये हुए  हैं।
यह बस्ती यहाँ पर करो रोल अपना ,
तो सारे कहेंगे जमाये हुए हैं।


क्रमशः... 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Friday, November 16, 2018

यही रंगशाला यही रंगभूमि

A poem of Umesh chandra srivastava 

यही रंगशाला यही रंगभूमि ,
यहीं रंग में सब जमाये खड़े हैं। 
सभी तो मुसाफिर यहाँ इस जगत में ,
फिर काहे को धुनी रमाये पड़े हैं। 

जरा गौर करके तो देखो-जगत को ,
लिखी पटकथा को जमाये हुए हैं। 
सभी बोलते चलते फिरते यहाँ पे ,
वह संवाद सारे रटाये हुए हैं। 

हुआ जन्म , उत्सव का दस्तूर है भी ,
वह दस्तूर तो बस बनाये हुए हैं। 
हुआ बालपन तो बहुत खेला-कूदा ,
जवानी में कुछ लड़खड़ाए हुए हैं। 

क्रमशः... 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, November 12, 2018

शूर्पणखा

A poem of Umesh chandra srivastava

क्या शूर्पणखा जरूरी है
राम का अस्तित्व समझने के लिए।
क्या राम का अस्तित्व
शूर्पनखा बिना अधूरा है।
समझने वाली बात है ,
स्त्री विमर्श के -
इस दौर में।
पुरुष की मनःस्थिति
वही  है
जो पहले थी।
विचार करने के लिए
स्त्री पर बात होती है ।
लेकिन , हकीक़त में
स्त्री तो ,
पुरुष के ह्रदय में ही सोती है
पुचकारने , दुलारने
और खेलने के लिए।
स्त्रियाँ - आदि काल से
विमर्श के केंद्र में हैं।
लेकिन यह पुरुष सत्ता
क्या उसे महत्व दे पाया।
समझने वाली बात है। 
भ्रम में मत रहो स्त्रियों।
लड़ो-बढ़ो
और मुहं तोड़ जवाब दो।
क्योंकि तुम्हारी महत्ता ,
पुरुष सत्ता से
कम नहीं।



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, November 6, 2018

पावन सुखद दीवाली आयी

A poem of Umesh chandra srivastava



पावन सुखद दीवाली आयी ,
हर घर-घर में खुशियां छायी।

हर्षित बच्चे फोड़ें पड़ाका ,
धूम-धड़ाका धूम-धड़ाका।
माँ लेकर के लावा चिउरा ,
लाई लायी लेकर मिठाई।

          पावन सुखद दीवाली आयी ,
          हर घर-घर में खुशियां छायी।
सुन्दर प्यारा त्यौहार हमारा ,
बढ़ता जिससे भाई-चारा। 
बाँट-वांट कर खाएं मिठाई ,
अद्भुत दिवस आज है भाई। 
         पावन सुखद दीवाली आयी ,
         हर घर-घर में खुशियां छायी।
सांझ पहर लक्ष्मी गणेश को ,
दीप जलाएं सब मिल भाई। 
प्रेम प्यार का छटा बिखेरें,
दीपावली आयी है भाई । 
          पावन सुखद दीवाली आयी ,
          हर घर-घर में खुशियां छायी। 






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...