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Wednesday, October 2, 2019

गाँधी बनो गाँधी

A poem of Umesh chandra srivastava


गाँधी होने का मतलब ,
सादगी,सहजता और मृदुलता।
सत्य, अहिंसा परमो धर्म ,
मगर यह सब अब कहाँ ?
जहाँ देखिये - वहां ,
यह सब भुनाए जा रहे।
अपनी-अपनी स्वार्थपूर्ती के लिए।
गाँधी बनो गाँधी।
गाँधी होने का मतलब समझो।
तब बनेगा देश ,
तब तनेगा राष्ट्र।
और तब हम कहलायेंगे ,
गांधी देश के वाशिंदे।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, July 24, 2019

आज वह भोर सुहानी फिर है

A poem of Umesh chandra srivastava



आज वह भोर सुहानी फिर है ,
आज दामन की कहानी फिर है |
आज रोको नहीं, कसम से तुम ,
आज जीवन में रवानी फिर है |
छोड़ो बैठो-सभी कुछ काम छोड़ो ,
जरा पलकों से निगाहें मोड़ो |
प्रेम मूरत तुम्हारे मुखड़े पर ,
आज गुलशन की निशानी फिर है |
चलो जलपान करले थोडा हम ,
वजन का भार थोडा बढ़ जाए |
प्रेम आलोक में जो टिम-टिम है,
आज उस बात की कहानी फिर है |


उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -

A poem of Umesh chandra srivastava

Tuesday, July 23, 2019

आज फिर तुमको बुलाना चाहता हूँ

A poem of Umesh chandra srivastava




आज फिर तुमको बुलाना चाहता हूँ ,
आज फिर उस दीप की चाहत मुझे |
रोशनाई में नहा कर प्रेम पूरित ,
आज फिर तुमको दिखाना चाह्ता हूँ |
तुम सदा से पास मेरे ही रही हो ,
तुम सदा से साथ मेरे ही रही हो |
प्रेम का वह राग छेड़ो फिर जरा तुम ,
आज मैं उसमें नहाना चाहता हूँ |



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, July 22, 2019

सावन पावन महीना है

A poem of Umesh chandra srivastava




सावन पावन महीना है ,
इसमें शिव का नगीना है |
भक्तों आओ जरा शिव धाम ,
भोले शंकर बुलाते हैं राम |
शिव की भक्ति है शक्ति अपार ,
श्रद्धा से सब करो नमश्कार |
कितना सुन्दर है लगता धाम ,
साथ बैठी है शक्ति वाम |
        सावन पावन महीना है ,
        इसमें शिव का नगीना है |


उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-

A poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, July 20, 2019

तुम्हारे आने से ,


A poem of Umesh chandra srivastava

तुम्हारे आने से,
मौसम बदल जाता है |
तुम्हारे मुस्कुराने से ,
फूल खिल जाते है |
तुम्हारे देखने से ,
सूरज लहलहाने लगता है |
तुम्हारा सुखद सहवास ,
शीतलता प्रदान करता है |
बहुत सोचता हूँ ,
कि तुम्हारे पास,
ऐसा कौन सा ,
गुरुत्वाकर्षण है ,
की सब कुछ ,
खिंचा-खिंचा लगता है |



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

A poem of Umesh chandra srivastava




Thursday, July 18, 2019

अभी तो बहुत काम है


A poem of Umesh chandra srivastava



अभी तो बहुत काम है ,
यहाँ-कहाँ आराम है|
वह तो फिकर में रह रहे ,
खुद वह बढे , खुद को गढे। 
मेरा तो बस मिजाज है ,
वह ही बढे , वह ही चढे। 

इस ज़िन्दगी के मायने ,
समझो कहाँ विराम है। 
अभी तो बहुत काम है ,
यहाँ कहाँ आराम है। 


उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-

Thursday, July 11, 2019

चंदा नहीं मोबाइल चाहिए

A poem of Umesh chandra srivastava




चंदा नहीं मोबाइल चाहिए ,
नन्हा बच्चा बोल रहा है।
पापा मुझको तुरंत दिलाओ,
भाव को अपने खोल रहा है।

मोबाइल में दुनिया भर की ,
खुब तस्वीरें देखूंगा।
मम्मी-पापा सुनलो मेरी ,
मैं भी उसमे फेकूंगा।

देख रहा हूँ रोज तमाशा ,
खिल-बिल सारे मिलते हैं।
एक दूजे को कमेंट लिख रहे ,
सामने कुछ नहीं कहते हैं।

मौन सिखाता यह मोबाईल ,
इसकी दुनिया न्यारी है।
बच्चे बूढ़े सभी जनों को ,
इसकी भाती क्यारी है।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Thursday, July 4, 2019

वह लिखते छंद शास्त्र से,

A poem of Umesh chandra srivastava


वह लिखते छंद शास्त्र से,
परिभाषित करके पढ़ते |
हम तो लिखते जग की बाते,
लोगो को केवल गढ़ते |
वह तो शास्त्र पुरोहित ठहरे,
शास्त्रों के विद्वान प्रबल|
अपनी बातो में रंग भरते ,
दूजे को केवल कहते |



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

निपट अनाड़ी तुम भी सुन लो

A poem of Umesh chandra srivastava



निपट अनाड़ी तुम भी सुन लो
कविता राग विराग सही
भावो का अवगुंठन सारा
यह केवल संवाद नही
अरे जरा कबिरा को देखो
लिखा सहा उस युग का सब
अब तो बानगी पेश कर रहे
उसमे रहना कुछ भी नही ...





उमेश श्रीवास्तव-
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, June 24, 2019

श्रद्धांजलि


A poem by Umesh chandra srivastava



श्रद्धांजलि सभा में जुटने वाले,
बड़ी निष्ठा से बोल रहे थे|
कि वह कितने- करीब थे उसके,
कितना चाहता था वह- उन्हें|
कितनी बेबाकी से लिखता था,
कबीरा के मंजर का दृष्टांत|
उनकी तमाम कवितायेँ,
मूर्तिभंजक, लोकरंजक,
और न जाने क्या क्या?
उनकी कविताओ में,
संघर्ष, वेदना और स्पृहाएं|
सब कुछ थी|
वह काल के गाल पर,
लिख देता था अटार|
टंकार कर कहता-
करो उसका प्रतिकार,
को हमे डूबोता हो,
समेटता हो|
उसे छोडो,
आगे बढ़ो|
विचारों की क्रांति का,
वह मशाल जलाओ|
जहाँ सारे मानक पुष्ट लगे |
तमान वैचारिक पड़तालों से,
नवाज़ा जा रहा वह|
आज स्मृति के झरोखों से,
निहार रहा था|
आये हुए लोगो की निष्ठां को,
खंगाल रहा था|
कि-कौन-क्या-क्या बहाना कर,
श्रधांजलि सभा से
खिसक रहे थे |
किसी ने किसी बैठक का,
तो किसी ने स्वाथ्य का,
रोना रोया|
और किसी ने कुछ कुछ और का|
अपने-अपने वक्तव्यों के बाद,
वह सब के सब,
फुर्र होते गये|
और अंत तक
श्रधांजलि सभा में,
पचास ये पांच ही रह गये|
जैसे लगा मुखाग्नि के बाद,
अपने ही सिर्फ दस-पंद्रह,
शेष रहते हैं|
बाकी सब वहा से,
 पलायन कर जातें हैं!
ठीक वही नज़ारा,
यहाँ भी था, यहाँ भी था, यहाँ भी था|
उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-
A poem by Umesh chandra srivastava


Sunday, June 23, 2019

मिट्टी-मिट्टी सोना उगले

A poem of Umesh chandra srivastava


मिट्टी-मिट्टी सोना उगले,
सोना-सोना मोती।
देश हमरा सर्वश्रेष्ठ है,
काहे को तू सोती।

सोना जीवन का वसूल नहीं,
जगना-जगना भाई।
जागोगे तब ही आगे हो,
बरसाओगे मोती।

अब तो भइया गजब ज़माना,
सत्ता खातिर होती।
लोगों को आपस में भिड़वाके ,
काट रहे हैं गोटी।

आओ देश सँवारे फिर से ,
कहाँ गयी क्यों सोती।
नारी धर्म निभाओ फिर से ,
देश  तुम्हीं से होती।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, June 22, 2019

जब मैं प्रेम में

A poem of  Umesh chandra srivastava

जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
तुम कैसे लगते हो।
कह नहीं सकता ,
बस जी करता ,
है कि तुम-
हममें समां जाओ
या फिर मैं-
तुममे समा जाऊं।
जब मैं प्रेम में
होता हूँ तो ,
लगता है
कि समय कैसे ,
बीत गया।
बेरहम समय ,
कितना क़साई है ,
कि मोहलत ही नहीं देता।
प्रेम तृप्ति हुई नहीं ,
कि समय बीत गया।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
समय को बहुत कोसता हूँ।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
अंदर का,
सारा श्रोता ,
स्रोत बन जाता है।
जब मैं  प्रेम में ,
होता हूँ तो




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of  Umesh chandra srivastava 

Wednesday, June 19, 2019

ऐसी कामना है खंजक

A poem of Umesh chandra srivastava


तुम विकट समय,
अवतरित हुए।
मूर्ति भंजक,
सबके रंजक।
तुम कहाँ गये ,
तुम हो तो बसे ,
सबके मन ह्रदय में-
कमल सदृश्य।
तुम राग-विराग में ,
चूर रहे।
पर लिखा-
बहुत ही दृढ होकर।
कबिरा की वाणी को गाया ,
उनकी वाणी को दोहराया।
गर्जन तेरा सब ,
अमर रहे ,
ऐसी कामना है खंजक।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

यह जो पेड़ कटे हैं

A poem of Umesh chandra srivastava

यह जो पेड़ कटे हैं
जड़े मुक्म्मल हैं |
दांव- पेच सारे चलेंगे,
लेकिन बात सुकम्मल है |
दो दरख्तों का दरकना,
अफसोस जनक है |
पर क्या किया जाए,
बिधना के आगे -
सारी बातें बेमानी है |




उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Tuesday, May 21, 2019

वह कुत्ता

A poem of Umesh chandra srivastava

वह कुत्ता -दुआरे
सुबह आके बैठा।
कोई टुकड़ा मुहं में ,
दबाये वह ऐठा।
करम बेल पर,
वह सुबह से ही लगता।
न कहता , न सुनता ,
करम वह है करता।
सुबह का अपिरिचित ,
अगर राहगीर है,
तो कुत्ता तो केवल ,
भौकता ही है रहता।
बताता वह अनजान ,
काहे को आया।
अनिष्टा का कोई,
बनेगा क्या साया ?
यह कुत्ता समझता ,
बहुत कुछ ही बेहतर।
हम मानव नहीं-
हो भी पाते हैं तर-तर।
यह कुत्ता सिखाता ,
बहुत सी ही बातें ,
कसम से वफादारी की सब सौगातें।
बताओ जगत में ,
कोई भी  ऐसा।
जो कुत्ते से ज्यादा वफादार हो ले।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, May 13, 2019

उस दिन छत के ,उपर देखा

A poem of Umesh chandra srivastava



उस दिन छत के,
उपर देखा।
मस्त पवन के,
झोकों सी तुम।
गेसू बिखराए,
सुन्दर ललाट पर,
कुमकुम,
गुमसुम,
आसमान की ओर,
टकटकी लगाये,
देख रही थी।

उस दिन आंगन में तुम,
आंगन बुहार रही थी।
कोमल सी मीठी बोली में,
कोई सुर संलाप लगाकर,
 सबको मुग्ध कर रही थी।

उस दिन घर में,
कोहराम मचा था।
भीड़ लगी थी।
घर-बाहर ,
आंगन दुआरे,
लोग कह रहे,
इतनी मृदुभाषी थी,
कुशल वयाव्हारी थी।
न जाने-वह कैसे,
काल के गाल में,
समा  चुकी थी।
लोग बोलते-
क्या थी-अभी उमर ही उसकी ?
खेलने-खाने के दिन,
वह-ऐसे
यूँ ही अचानक ,
चली गयी।
कोई कहता,
अभी तो वह ,
एकदम नयी नवेली,
दुल्हन बन आई थी।
साल बरस,
अभी पांच ही बीते,
कि वह चली गयी।
ना जाने किस,
भय आतंक की,
शिकार हुई।
या घर वालों के,
कोपभाजन में,
हलाल हुई।
पुलिस भी सक्रिय रही,
वहां पर।
न जाने क्यों ?
उसका ललाट मुख,
अभी दमक रहा था।
आखें-फटी,
पथरीली-कुछ,
बयाँ कर रही।
इसी बात पर,
शंका के बादल मंडराए,
उम्र शेष थी,
फिर भी गयी,
या वह भेजी गयी वहां !
जहां से कोई नहीं लौटा।
घर वाले सब,
शक के घेरे में,
 पूछ ताछ थी जारी,
वह थी खामोश,
बयां की लाश बनी,
पृथ्वी के आँचल में,
पड़ी-गली,
एकदम चिर निद्रा में, 
उस दिन छत के,
उपर देखा।
मस्त पवन के,
झोकों सी तुम।





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, May 12, 2019

देखा उसको

A poem of Umesh chandra srivastava
देखा उसको,
पंच सितारा महल,
निर्माण स्थल पर।
ईंटा ढोती,
बच्चे को पीछे,
पल्लू में लिटाये,
कर्मरत दृष्टि अपार।
माँ का धर्म निभाती,
मजदूरी करती,
दृष्टि-वृष्टि में हहराती,
बनी मनुजाधार।

कर्मणा मजदूरिन
सीढ़ी चढ़ती,
और उतरती।
बात-बात में,
फुस हंस देती।
देख रहे सब उसको एकटक,
पीछे लिटा बच्चा-
किलकारी भरता,
लात मरता,
हुंकारी भरता,
पर वह माँ,
अविरल उसको,
प्रेम, प्यार, पुचकार में तत्पर।
                        देखा उसको,
                        पंच सितारा महल,
                        निर्माण स्थल पर।



उमेश चद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, May 11, 2019

माँ है चन्दन, माँ है पानी

A poem of Umesh chandra srivastava


माँ है चन्दन, माँ है पानी,
माँ ही व्रत त्यौहार है। 
माँ है धरती, माँ है गंगा,
माँ से जग उद्धार है। 
माँ के बिन  है कौन बना नर,
माँ ही जीर्णोद्धार है। 
माँ की बलैया सुख की साथी,
माँ ही तो पतवार है। 
माँ का पद है सबसे ऊँचा ,
माँ का स्नेह अपार है। 
माँ ही सारा मार्ग दिखाती ,
माँ ईश्वर, माँ सार है। 
माँ से चलती जगत त्रिवेणी ,
माँ संगम, अभिसार है। 
माँ की सम्पूर्णता में सब कुछ ,
माँ का नाम अपार है। 

        



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Friday, May 10, 2019

नेताओं को नेता से लड़ाने के लिए

A poem of Umesh chandra srivastava

नेताओं को नेता से लड़ाने के लिए ,
क्या यह चुनाव इसीलिए है ?
भद्दी-भद्दी बातें-आपस में बोलते ,
जनता  मूर्ख बनाने के लिए।

रोज-रोज धरम और  जाति-पात को,
कहते और सुनाते हैं जताने के लिए।
हम आपके-आप सिर्फ मेरे हैं ,
ऐसी-ऐसी बातों से बहलाने के लिए। 

जो कभी एक दूसरे के विरोधी 
वोट खातिर एक जमात हो गये। 
दूजे सत्य आड़ में खेल कर रहे ,
केवल सिर्फ वोट हथियाने के लिए। 

नियम और क़ानून का क्या है फायदा ,
ये सारे  कायदे हमारे लिए हैं। 
नेताओं का हुक्म क़ानून समझ लो ,
सारे दांव-पेंच फंसाने के लिए। 

आया महापर्व वोट डाल लो ,
नेताओं का हुक्म बजाने के लिए। 
पांच साल बाद ये फिर आएंगे ,
झूठी मूठी बातों को दोहराने के लिए।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, May 4, 2019

यहाँ सब हैं योद्धा, सभी प्रेम योद्धा,

A poem of Umesh chandra srivastava .

यहाँ सब हैं योद्धा, सभी प्रेम योद्धा,
नहीं है जगत में कोई भी विध्वंसक। 
सभी जग के प्राणी अहिंसक-अहिंसक,
इन्हें प्यार दे दो ये प्रेम पुजारी।
करो और दिखाओ, ये करना बताना ,
जगत की ये बाते सभी को सुनाना।
      वही रोज आना-वही रोज जाना ,
      वही रोज बातों का कहना सुनाना।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava . 

Thursday, May 2, 2019

माधो ! ३

A poem of Umesh chandra srivastava 




-उमेश चंद्र श्रीवास्तव 


A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, April 30, 2019

माधो ! -२

A poem of Umesh chandra srivastava 

-उमेश चंद्र श्रीवास्तव 
A poem of Umesh chandra srivastava 

माधो !

A poem of Umesh chandra srivastava



Wednesday, April 17, 2019

एक बंद

A poem of Umesh chandra srivastava


कितने सूंदर नैन तुम्हारे ,कितनी सुन्दर बातें हैं।
एकदम फूल कमल दल लगते , कितनी सुन्दर दाते हैं।
मुखड़ा चंद्र मलय सा लगता , पपवणता की मूरत तुम।
मन करता बीएस तुम्हें निहारुं , कितनी सुन्दर साँसे हैं।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, April 16, 2019

इतना जियादा है

A poem of Umesh chandra srivastava


समझ लो प्रेम तुमसे इस कदर ,
इतना जियादा है।
बदन का सारा पानी अब ,
समझ लो आधा-आधा है।

रुधिर सब सूख जाते ,
बदन में सरसराहट है।
तुम्हारे आने से समझो ,
मोहब्बत फरफराहट है।

नज़र के फेर से दुनिया,
समझ लो बदल जाती है।
तुम्हारे देह की जुम्बिश ,
समझ लो कसक जाती है।

बहुत चाहा कि हम तुम,
साथ में थोड़ा कदम चल लें।
मगर ये दुनिया वाले तो,
यहाँ इलज़ाम देते हैं।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Thursday, April 11, 2019

कालरात्रि

A poem of Umesh chandra srivastava


माँ काली के आराधन से ,
जनम, मरण पोषण मिलता।
शक्ति स्वरूपा हे माँ काली ,
तेरा वंदन अभिनंदन।

तेरी कृपा से सृष्टि चलती,
सब जान का आँचल भरती।
तू ही एक सहारा माँ है ,
तेरा जग गुणगान करे।

शिव की प्यारी, शिव की दुलारी,
काली नाम अमर हुआ।
तेरे चरणों में माँ वंदन ,
रोली, ऐपन,  चन्दन है।

तेरा ही गुण नित मैं गाउँ,
ऐसा माँ दे दो वरदान।
भक्त तुम्हारा चरणों में है,
 मद और मोह को दूर करो।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, April 10, 2019

कात्यायनी माँ तुझे प्रणाम

A poem of Umesh chandra srivastava


माँ का रूप निराला जग में,
कात्यायनी माँ तुझे प्रणाम।
कात्यायन ऋषि के खातिर,
सुता बनी उनकी माँ तुम।

कुल भी उनका माना तुमने,
गोत्र को भी स्वीकार किया।
तेरा प्रेम है अविरल माता,
तू जग की कल्याणी माँ।

आज रात में तप होता है,
आज जागरण सब करते।
रूप राशि की खान है माता,
माता तुमको कोटि प्रणाम। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, April 9, 2019

स्कंदमाता

A poem of Umesh chandra srivastava 
नारी शक्ति, मातृ शक्ति,
स्कंदकुमार की माता तुम। 
तेरा अविरल गान करे हम,
गणपति तेरे मानस सुत।
तरकासुर से मुक्त कराया,
 जननि तुमको कोटि प्रणाम।
पूजा-ऐपन की थाली ले,
माँ तेरे हम धाम गए।
श्रद्धा से भक्ति से माता,
तेरा ही गुणगान करें।
जग की धात्री हे माँ तुमको,
नमन-नमन है सुबहो शाम।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

कुष्मांडा माँ तेरा अर्चन

A poem of Umesh chandra srivastava 





माँ देवी का आराधन है ,
प्रकृति, पर्यावरण की अधिष्ठात्री |
कुष्मांडा माँ तेरा अर्चन ,
करता हूँ कर जोड़ सही |
तू ही माँ सृष्टि विस्तारक ,
तेरा तेज है सूर्य सामान |
जग के हर नारी-नर का ,
माँ अब कर दे तू कल्याण |
जप 'औ' ध्यान तुम्हीं से हे माँ ,
धरती को पल्लवित करती |
तृप्ति, तुष्टि दोनों तुमसे ,
माँ तुमको है कोटि प्रणाम |





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -


A poem of Umesh chandra srivastava 

तेरा रूप निराला मां है

A poem of Umesh chandra srivastava 




तेरा रूप निराला मां है,
शांति, नाद की तू प्रतिरूप।
तेरे चलते सुर जीते थे,
असुर काल के गाल रहे।
आज जो क्रंदन करते रहते,
उनको बुद्धि - विवेक तो दो।
कारापन सब दूर हो उनका,
सत्य मार्ग के पारखी हो।
गाल बजाना, छिटाकशी,
दोनों छोड़ वह लय में रहे।
बातें जो भी वह तो बोले,
उससे जग का वेग बहे।
मां यह विनती कर जोड़े हैं,
उनमें शांति रस भर दो।
प्रेम प्यार का गीत वह गाये,
ऐसा मां तुम वर दो |





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -


A poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, April 7, 2019

ब्रह्मचारिणी हे माँ तुमको

A poem of Umesh chandra srivastava 


ब्रह्मचारिणी हे माँ तुमको,
कोटि-कोटि है सहस्र प्रणाम।
ब्रह्मा सुता माँ श्रिष्टिकरिणी,
तुझसे ही जग का निर्माण।
तेरी दृष्टि सदा हो हम पर,
वृष्टि तेरी बनी रहे।
जगत धरणी, तू कल्याणी,
तेरा आराधन प्रतिपल।
लोक दृष्टि पर कृपा करो माँ,
वचन धर्म से विरत हुये।
एकसूत्र में पिरो-पिरो कर,
सब जन में समदृष्टि दो।
माँ तुम, माँ तुम यह वर दो।





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, April 6, 2019

शैल सुता माँ तुम्हें प्रणाम


A poem of Umesh chandra srivastava

माँ के चरणों में है वंदन,
शैल सुता माँ तुम्हें प्रणाम |
नमन तुम्हारा हरदम कर लें,
ऐसा माँ दो तुम वरदान |
तेरी महिमा जग भर गाये ,
तू कारा को दूर करे |
मन से कलुषित भाव मिटा के ,
उसमे तू नवरस भर दे |





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, March 23, 2019

अबकी होली में कोई रंगो की बरसात न हुई

A poem of Umesh chandra srivastava



अबकी होली में कोई रंगो की  बरसात न हुई,
अबकी होली में कोई मधुर सी सौगात न हुई।

वह दिन और थे जब रंग में रंगे हम रहते ,
गुझिया, पापड़ 'औ' समोसे को तल-तल रखते।

अब हम हैं और हमारे संघी साथी ,
वक्त का दौर है अब कोई नहीं बाराती।

अब तो आएंगे बहुत सधे हुए मेहमाँ भी ,
चाय वह फीकी और नमकीन थोड़ा लेंगे ही।

बहुत उम्मीद की होली है और बोली भी ,
अबकी होली में कोई सावन सी बरसात न हुई।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, March 20, 2019

होली

A poem of Umesh chandra srivastava



होली रंग अबीर का ,
प्रेम मिलान त्यौहार।
आपस में हम बैठ के ,
बाटें यह व्यवहार।

होली के रंग में रंगे ,
सड़क गली मैदान।
सब में दिखे एक रंग,
मस्ती में हुड़दंग ।

प्रेमी के संग प्रेम का ,
संघी के संग दंग।
होली में जब हम मिलें ,
देखो फिर तो भंग।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, March 16, 2019

हे भारत के भाग्य विधाता

A poem of  Umesh chandra srivatava


यह अवसर जाने न पाए ,
लोकतंत्र का पर्व है आया।
अपने  वोटों की कीमत का ,
बड़ा सुनहरा अवसर आया।

किसको वोट करेंगे हम सब ,
इसपर जम कर मंथन करलो ।
लेकिन वोट अवश्य ही देना,
हे भारत के भाग्य विधाता।




 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of  Umesh chandra srivatava 

Friday, March 8, 2019

देवी नहीं , भारत की नारी

A poem of Umesh chandra srivastava



देवी नहीं , भारत की नारी ,
पतवार बनो तुम सुलभ दुलारी।
जग को तुम पर नाज़ है।
भारत की गौरव गाथा तुम।
अपना देश महान है।


सदा परीक्षा से गुज़री तुम ,
सीता , सती , सावित्री तुम।
तुम भारत की वीर सपूती ,
तुम पर सब कुरबान है।

सदा-सदा से लाज बचाया ,
सदा-सदा संघर्ष करो।
हम सब वीर सपूत जहां के ,
तुम पर सबको नाज़ है।

सुलभ दृष्टि, ममता की छाया,
पुत्री, माँ, बहना हो तुम।
कर्मावती, दुर्गावती तुम हो ,
तुम पर सब बलिदान है। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...