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Thursday, October 4, 2018

तुम्हारे बाहं में

A poem of Umesh chandra srivastava

तुम्हारे बाहं में ,
आनंद का सार ,
मन विहंग -पूरा निस्सार।
      तुम्हारे बाहं में ,
      आनंद का सार।

कौतुहल , संवेग 
आवेग सब विस्तार ,
मगर तुम्हारे बाहं में,
उन सब का निस्सार।

तुम कौन
सरस नीर का
अनमोल रहस्य।
तुम्हारे नीर में
अनुपम
युगबोध का संसार।
         तुम्हारे बाहं में ,
         आनंद का सार।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

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