month vise

Thursday, July 27, 2017

दो मुक्तक

Umesh chandra srivastava's poem

                  (1)
शब्द को कुछ अर्थमय विस्तार दो,
बिम्ब में भावों का बस संचार दो।
वह नियंता है स्वयं ही रच रहा,
बात के उसके ही बस गति सार दो।

                    (2)
चार पहर से सोच रहा था, तुम भी आओ तोता-मैना,
बरबस निरस-निरस मन होता, तुम ही खिल जाओ तोता-मैना।
 चाँद चकोरी बिरहन तडपे, मत भरमाओ तोता-मैना,
आप तो सहज-सहज रहने दो, तुम भी आओ तोता मैना





उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
Umesh chandra srivastava's poem 

No comments:

Post a Comment

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -20

A poem of Umesh chandra srivastava मनु श्रद्धा हों , चाहे जो भी , आकर्षण से खिचे रहे। तभी तो सृष्टि का कुसुमित पल , सहसा फिर स...