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Saturday, March 24, 2018

बेरोज़गारी की तपन

A poem of Umesh chandra srivastava

उस रोज ,
सुबह उठते ही ,
बच्चे को दूध पिलाती-सुधिया।
बार-बार ,
अपनी छाती देखती ,
और पति से कहती ,
दूध नहीं हो रहा है।
हमे कोई गम नहीं ,
न मिलेगा , न खाएंगे ,
पर वह निवाला ,
जरूर ला दो ,
ताकि दूध तो बने।
और पति लाचार ,
देखता-अखबार।
रिज़ल्ट आ चुका ,
नियुक्ति पत्र की आस में ,
इस दूसरी पीढ़ी को झोकता हुआ ,
बेरोज़गारी की तपन-
को महसूस कर रहा है।







उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

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