month vise

Friday, November 11, 2016

जीना जंजाल हुआ, दुनिया की बातें

जीना जंजाल हुआ, दुनिया की बातें ,
इनकी सुनो,उनकी सुनो, कैसे कटे रातें।
कहते हैं चोर नहीं , पैसा कहाँ पाए ,
जीवन के संगति में, जोड़-तोड़ आये।
सोचा तो नहीं था , कैसे दिखाएँ ,
माल थोड़ा ज्यादा है ,समझ में न आये।
जाएँ जमा करने, राज खुल जाये ,
इसी उधेड़ बुन में, जंजाल बना जीवन।
ठोक-ताल नेतृत्व , बांछे तो खिल गयीं,
जनता जनार्दन प्रशंसा में जुट गयीं।
जी का जंजाल हुआ ,उनका अब जीवन ,
कैश रख मौज से ,मोछा जो टेयें ।
अब तो हे भैया , मोछा कहाँ  जाये ,
लाग-लपट में , दिनचर्या भरमाये।
सुबक रहे भीतर ही ,आंसू न छलकाऐं ,
कौन जतन करें ,अब पैसा क्या दिखाएँ।
बात सारी समझ बूझ ,रणनीति बनाये,
कैश को कहाँ-कहाँ जमा करने जाये ?
चाप बड़ा तगड़ा है ,मुहं क्या दिखाए?

 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -












Thursday, November 10, 2016

बोट-नोट का चक्र चला तो

बोट-नोट का चक्र चला तो ,
दुनिया हो गयी फानी। 
अमरीका में बोट का डंका ,
ट्रम्प बने गुणखानी।
भारत में नोटों की महिमा ,
बड़-बड़ हो गए पानी। 
पासा फेका ऐसा -उनने ,
चारो खाने चित। 
क्या बोलें ,क्या-क्या खोलें ?
सिट्टी-पिट्टी गुम। 
मात्र यही कथन है वाजिब ,
काम हुआ है अच्छा। 
मोदी तुमने ठोका -
ताल-तुम्हारे में सब हो गए रुंध, 
बड़े-बड़े तूफानी। 
धन्य-धन्य हे भारत सुत तुम ,
तुमको कोटि प्रणाम। 
जनता का भी खट्टा-मिट्ठा ,
अनुभव बाटो अविराम। 
यही तुम्हारा उद्घोष ,
रमे हुए जो सब में। 
समझो-दूर दर्शी तुम तो हो ,
बात समझ लो मेरी। 
बस यही आकांक्षा तुमसे ,
स्वार्थ से उठ कर सोचो। 
आना-जाना कुर्सी का तो ,
लगा हुआ है रहता।
कर जाओ वह काम भी प्यारे ,
बन जाओ सुत पक्के। 
भारतवासी 'औ' भारत माँ ,
तुम्हे देंगे आशीष। 
बढ़ो , करो बस एक काम तुम ,
अच्छे-अच्छे भाई। 
मानव मन  में धर्म की आस्था ,
अपनी-अपनी होती। 
यही हमारा धर्म मनुज है ,
विमर्श करो , कुछ सोचो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, November 9, 2016

नहीं चाहता याद तुम्हारी

नहीं चाहता याद तुम्हारी ,नहीं चाहता तुम आओ,
यही चाहता रहो जहां तुम ,फलो-फूलो 'औ' आगे बढ़ो।
दुनिया का संताप तुम्हे ,छूने से भी घबराएं ,
कर्म बेली के पथपर आगे , बढ़ो और नित कर्म करो।
विगत का सम्मान करो 'औ'वर्तमान में सुखी रहो ,
आगत का संजो कर सपना ,कर्म मार्ग पर डट जाओ।
तुम्हे मिले हर दिन सुन्दर सा , सुन्दर सा तुम फूल बनो ,
महको खूशबू से अपनी ,जगत सुधामय हो जाओ।
तुम तो अलग-विलग की बातें,न सोचो न ध्यान करो,
कंटक राहों को सुलझाओ 'औ' नया तुम मार्ग गढो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Tuesday, November 8, 2016

जीवन मिला तो जीना इसे है

जीवन मिला तो जीना इसे है। 
जीने की भी तो बहुत सी कला है। 
पकड़ हाथ चल दो -जो साथी बने हैं। 
करम से जो अपने पैर पे खड़े हैं। 
उन्हें साथ करके-आगे बढ़ो तुम। 
डगर सत्य होगा, करम जो सही। 
यहाँ भाग्य कुछ भी,करम के बिना क्या?
कायरों की बातें ,इसे त्याग बढ़ लो। 
वही बात सच है ,कुटुंब से मिला जो। 
ज़माने की चादर में मत ही पड़ो तुम। 
करम बेल पथ है ,करम ही सभी कुछ। 
इसी बस कला को ,जीवन में धर लो। 
मिलेगा जो चाहो ,नहीं कोई बाधा। 
डगर एक जीवन का , इसको बना लो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, November 7, 2016

सुबह बात एकदम ही ताजी मिलेगी

सुबह बात एकदम ही ताजी मिलेगी ,
सुखद रोशनी में ये दुनिया खिलेगी।
चमन में जो महके ,वो फूल पड़े हैं ,
उसी गंध में तुम-जरा मुस्कुरा दो।
नहीं जिंदगी में कोई पैबंद रखना ,
कि फूलों के जैसा जीवन में महक लो ।
आओ साथ चल दें ,उसी गुल चमन में ,
जहाँ सत्य ,गंध 'औ' मौसम सुखद है।
यही तो है जीवन की खुशियां लहर है,
सभी जीव अपने-यह प्यारा जगत है।
संजोना सभी को ,हो सम्बन्ध अच्छे ,
यही साथ जायेगा बस सोच लेना।
गुलों का गुलिस्ता यह जीवन वशर है ,
सुखद रागिनी के ही मौसम में रहना।    


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -    

Sunday, November 6, 2016

डम-डम-डम डमरू बाजे

डम-डम-डम डमरू बाजे डम-डम-डम।
मंचों पर नेता है नाचें ,
आवाजों में खनक नहीं है।
 चिल्लाहट और नारे हैं।
लोकतंत्र के अजब पहरुए ,
तेरा कैसा तंत्र बना ?
कहते हो -जब हम आएंगे ,
नंबर वन प्रदेश बनेगा।
स्वार्थी पुतले , ओ नेताओं ,
मुख से तो -समवेत रहो।
झूठी वाणी ,झूठे वादे ,
जनता मुर्ख नहीं होती।
माना जनता सदियों से ही ,
सोती 'औ' बधिर बानी।
पर तेरा क्या फर्ज है पुरुषों ,
पुरुषोचित कुछ कर्म करो।
कैसे आये - तुम गलियों से ,
सड़कों पर मत नृत्य करो।
माना तेरा कुम्भ है आया ,
झूमो,नाचो, मस्ती में ,
दम्भी बन कर -तुम मंचों पर ,
जनता को भरमाते क्यों ?
कौन सत्य है -जो तुम कहते ,
असत्यों के पुतले तुम।
लोकतंत्र की मर्यादा को-
तार-तार, खंडित करते।
अपना-अपना कुनबा भरते ,
अपनी पार्टी का गुणगान।
अपने मुख से अपनी करनी ,
दूजे की भी -तुम सुन लो।
वह मजलूम -खड़ा कोने में ,
फटेहाल-जो सुनता है।
उसको पीछे ,क्यों करते हो ?
आगे -उसको कर, बोलो।
जनता भीतर -जो आकांक्षाएं ,
उसका कुछ परिमार्जन हो।
वार्ना जीतो ,कुर्सी पकड़ो ,
भ्रमण करो ,तुम जी भर के।
फूलों का गलमाल पहन कर,
मंचों पर बस इतराओ। (आगे फिर कभी... )  


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -












Saturday, November 5, 2016

कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं

कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं ,
तो मैंने कुछ गीत लिखे। 
गीतों में सरगम कुछ चाहे ,
हो भी न हो फिर भी तुम। 
सुनो हमारे इन गीतों में ,
प्रेमी का मनुहार नहीं। 
नहीं छंद है इसमें कोई ,
अलंकार की बात सही। 
मगर मैं लिखना चाहूँ ऐसा ,
गीतों में मानवता हो। 
मानव मन में दम्भ न कोई ,
बस करुणा की बातें हों। 
वह जो सड़क तरफ कोने पर ,
घिघियाति बैठी है-जो। 
नहीं मांगती पूँजी,दौलत ,
भिक्षा दे दो तुम उसको कुछ। 
क्या सब हो गयी इतिवृत्ति अब ?
नहीं मनुज तुम, नहीं उसे दो ,
भिक्षा ,केवल काम दो। 
फिर देखो वह बबुनी बनकर ,
नाम करेगी अपना भी। 
और एक नागरिक जुड़ेगा,
भारत का जो सपना है। 
हम सब एक समान बनेंगे ,
गर इस हित-हम सोचें सब। 
यही बात कहानी है केवल ,
यही के कारन गीत लिखा। 
       कुछ पीड़ाएँ प्रबल हो गयीं ,
       तो मैंने कुछ गीत लिखे।

 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -






Friday, November 4, 2016

यह कविता संसार है सारा

यह कविता संसार है सारा ,
तरह-तरह के फूल  इसमें। 
कुछ में महक ,हैं कुछ बिन महके ,
लेकिन सब में अपनी रंगत ,
कोई चुने , कोई चढ़ाये ,
भक्ति भाव से ,श्रद्धामय हो ,
सबको इससे प्रेम सहज है। 
कोई भेद भाव नहीं इसमें,
हिन्दू ,मुस्लिम,सिक्ख ,ईसाई ,
सब में यह है सबसे दुलारा। 
          यह कविता संसार है सारा ,
          तरह-तरह के फूल  इसमें। 
हिमगिरि के उत्तंग शिखर पर ,
फूल सहज ही खिल जाते हैं। 
जीवन का संचार है उसमे। 
वह देता है भव को अमृत ,
उसमे दोनों भाव हैं मिलते। 
श्रद्धा,भक्ति समन्वय सारा। 
          यह कविता संसार है सारा ,
          तरह-तरह के फूल  इसमें। 
भोर पहर यह खिल जाते हैं। 
प्रकृति के श्रृंगार यही हैं। 
प्रकृति में यह रचे-बसे हैं। 
प्रकृति के उद्गार यही हैं। 
इनसे जीवन जीना सीखो। 
प्रेम और गुलजार यही हैं। 
हरदम हरपल देते रहते। 
कभी नहीं लेने की इच्छा। 
यह तो प्रकृति सुकुमार बहुत हैं।  
इनसे मिलता है सुख सारा। 
              यह कविता संसार है सारा ,
               तरह-तरह के फूल  इसमें।  
आवागमन लोक का सच है। 
काम,क्रोध,मद,लोभ यहाँ है।
प्रेम यहाँ स्थायी भाव। 
बाकी तो सब संचारी हैं। 
सुख दुःख की हैं परतें यहाँ पर। 
कर्मो से सब बंधे हुए हैं। 
कर्मो का रिश्ता है सारा। 
             यह कविता संसार है सारा ,
             तरह-तरह के फूल  इसमें। 










 

Thursday, November 3, 2016

दुर्दिन में आंसू पीकर के

दुर्दिन में आंसू पीकर के ,
स्मृति का देखा बस लेखो।
ढरके मन को विश्राम करो,
बस मौन रहो, तुम मौन रहो। 
काट जायेंगे विश्रांत बादल, 
आने-जाने दो जीभर के।  
आराम शांत बस मौन रहो। 
कट जायेंगे  दुःख रजनी के। 
हर रात के बाद सवेरा है ,
हर सुबह के बाद शाम आती। 
पीड़ाओं की गठरी भी तो,
ऐसे ही चली-चली जाती। 
छलकाओ मत आंसू अपना ,
यह नयन रतन के मोती हैं, 
इनको तो सजोना है तुमको,
सुख में ही बरसाना इनको,
ये सुखद सहज सगोति हैं। 
          दुर्दिन में आंसू पीकर के ,
         स्मृति का देखा बस लेखो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, November 2, 2016

चन्दन, रोली, आरती

चन्दन, रोली, आरती, हाथ फूल 'औ' माल।
जीवन का सुख इसी में, नित हो गाल गुलाल।
नारी जग की है सखी, गर तुम करलो प्रीत।
वरना वह दुर्गा बानी, हर लेगी हर खींस।
खींस निपोरे जग फिरो, कुछ न होगा काम।
गर तुम प्रेम में रमोगे, जीवन हो सुखधाम।
आथर-पाथर जोड़ना, जीवन का नही मोल।
प्रेम परस्परता बस करो, इसी में जग की जीत।
वरनाो जगत भर, आवारा पशु भात।
कुछ भी न मिल पायेगा, जाते हुए अनाथ।
इसी लिए मैं कह रहा, जीवन एक संगीत।
प्रेम का गो गीत बस, रो बने जगदीस।

उमेश चंद्र श्रीवास्तव-

Tuesday, November 1, 2016

हिमंग शुभ्य भारती

A poem of Umesh chandra srivastava


हिमंग शुभ्य भारती ,तरंग ,उमंग उकारती।
विहंग दंग देखते , तिरंग ज्ञान भारती। 
कहे चलो ,कहे चलो, मिटे जनों की कालिमा। 
प्रफुल्लित होये लालिमा , प्रसन्न झूमते चलो। 
                                    कहे चलो, कहे चलो। 
बिगत तो बीत अब गया, आगत की सोच ज्ञानती। 
निर्विघ्न मार्ग हो प्रशस्त , सुधि बने सभी ये जन। 
यही है आश भारती ,कहे चलो ,कहे चलो। 
नगर-नगर ,डगर-डगर ,चमन हो गुल चषकमयी। 
गमक में उसके झूमते , चले नगर -नगर सभी। 
कहें सभी-सभी यहाँ ,है भारती , है भारती। 
                                        कहे चलो कहे चलो। 
प्रताप ,उनका शौर्य है ,उल्लास उनकी दृष्टि है। 
सुपुष्ट देहं  धारियों , स्वदेश के पुजारियों। 
कहे चलो , कहे चलो ,तिरंगा मेरी शान है। 
यह भारतीय की शान है ,उठा इसे कहे चलो। 
                                        कहे चलो , कहे चलो। 
न कोई सर उठा सका , न पार कोई पा सका। 
भुजंग जितने आ डटे , हटा, हटो कहे चलो। 
कहे चलो ,कहे चलो ,सब प्रेम भाव पास हो। 
बस समृद्धि की आश हो ,सुसंस्कृत हों जन सभी। 
                                        कहे चलो ,कहे चलो। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 










काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...