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Saturday, February 3, 2018

कविता

A poem of Umesh chandra srivastava 

दम तोड़ती कविता,
घिघियाती कविता ,
राह की तलाश में ,
भटकती कविता।
तमाम धाराओं ,
आंदोलन में ,
सिमटती कविता।
हर कालावधि में ,
प्रवंचना की पात्र ,
बनती कविता।
लगातार-
तमाम अवरोधों ,
विरोधों को सहती कविता ,
बराबर चल रही है।
या बराबर खल रही है।
क्या किया जाए ,
इस कविता को लेकर।
मौन पड़ी ,
पुकार रही ,
या फिर ,
कुंडली मार रही ,
इस कविता का !




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umehs chandra srivastava 

Thursday, February 1, 2018

छांट

A poem of Umesh chandra srivastava

जीवन की आंव में ,
सारे दांव चल चुके।
अब मोहताज ,
दाना पाने को।
पूरे जीवन -
सबको काटा-छाटा !
तो अब , जीवन के ,
इस ठौर में ,
छांट दिए गए।
समाज , कुटुंब
और परिवार से भी।



उमेश चंद्र श्रीवस्तव-
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, January 30, 2018

मैं जीने के लिए आया हूँ

A poem of Umesh chandra srivastava 


मैं जीने के लिए,
आया हूँ ,
काया का ,
जाना तँय है। 
मगर-
वह जीवन चाहिए ,
जो जाने के बाद ,
भी याद रहे। 
कुछ ऐसा हो ,
जिसे लोग ,
जाने के बाद भी ,
सहेज सकें। 
चर्चा कर सकें। 
वही जीवन ,
जीने आया हूँ। 
जहाँ पात्रों की ,
सरसराहट में ,
विचारो की पतंगें ,
उड़ें-लहरायें ,
लेकिन काटें न । 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, January 27, 2018

माँ

A poem of Umesh chandra srivastava

माँ तुम्हारी याद में ,
बरसों गुजारे हैं।
तुम्हारी बात के-ओ माँ ,
बहुत किस्से सँवारे हैं।
बड़ी मुद्दत हुई ,
अब आंचलों की ,
फिर ज़रूरत है ,
मगर हम क्या करें ,
जो सत्य है ,
स्वीकार करना है।
ज़माने में ,
बहुत चेहरे ,
मगर माँ ,
तेरा चेहरा तो ,
सभी से खूब लगता है।
तुम्हारी आँख में ,
ओ माँ ,
जहां  का नूर बसता है।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 
A poem of Umesh chandra srivastava

Friday, January 26, 2018

गणतंत्र दिवस मुबारक हो

A poem of Umesh chandra srivastava 


सुन्दर दिवस मुबारक सबको ,
यही दिवस तो गहना है। 
भारत के ओ वीर सपूतों ,
इस आँगन में रहना है। 



 उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 

Thursday, January 25, 2018

राष्ट्रध्वज

A poem of Umesh chandra srivastava

राष्ट्रध्वज के मान का ,
नूतन सवेरा।
विश्व विजयी ही रहे ,
कितना उजेरा।
संग-साथी-
प्रेम में सदभाव से ,
इस पर्व पर-
कुछ लें शपथ ,
इस चाव से।
रूप-रस की गंध में ,
इसके समाये ,
भाव में बरबस ही ,
इसका प्रेम लाएं ,
'औ' तिरंगे को ही,
बस आगे बढ़ाएं।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Wednesday, January 24, 2018

शब्द

A poem of Umesh chandra srivastava

शब्द को पकड़ना ,
शब्द को जीना ,
दोनों में फर्क है।
आज लोग ,
पकड़ रहे हैं शब्द ,
लेकिन जी नहीं,
रहे शब्द !



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Friday, January 19, 2018

अमरत्वता की तलाश

A poem of Umesh chandra srivastava

शहर से दूर ,
प्रतिष्ठान पुरी में ,
वह रहने वाला ,
प्रतिष्ठित व्यक्ति ,
लोगों के घर-आँगन ,
में तिरता ,
और अपनी ,
रचना , कहानी में ,
उन्हीं लोगों को रचता।
बानगी में बेमिसाल ,
सबके हाल चाल की ,
चिकोटी काटने वाला ,
आज रसूलाबाद घाट पर ,
चित्त-चिता पर पसरा है ,
लोग उसे देखते-कहते ,
और तमाम प्रकार ,
संगत-असंगत ,
चुटकियों से नवाज़ते।
लेकिन-वह ,
सपाट चेहरे लिखने वाला ,
आज खुद सपाट पसरा ,
पता-नहीं क्या सोचता ,
कि तभी चिता की ,
लपटों में उसका शरीर ,
पंचतत्व में विलीन ,
होने को आतुर।
नम पड़ी आँखों के बीच ,
वह धीरे-धीरे , हो गया ,
पंचतत्व में विलीन।
किन्तु उसका वह रचाव ,
अब पायेगा ,
अपना असली मुकाम।
वह नवाज़ा जाएगा ,
न जाने कितने -
संगत-असंगत ,
विचारधाराओं से।
यही तो हर व्यक्ति का ,
और उसका भी ,
होता है लक्ष्य।
शारीर चला जाता है।
व्यक्ति नहीं रुक पाता ,
लेकिन व्यक्तित्व ,
ज़िंदा रहता है ,
अपनी अमरत्वता की ,
तलाश में।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Thursday, January 18, 2018

माघ मेला (चौपाई-4)

A poem of Umesh chandra srivastava

देखत माघ मकर सब कोई , सब जहँ राम राममय होइ।
राम धुनहिं गुंजहिं चहुँ ओरा , दिवस रात सब होइं चकोरा।।

चन्दन फूल अछत जग माहीं , सुरसरि तीर सबहिं सुख पाही।
जो नर ध्यान करई इन माहँइ , सो बैकुंठ जाई सुख पावइँ।।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, January 16, 2018

माघ मेला (चौपाई-3 )

A poem of Umesh chandra srivastava

जाके मन कछु नाहीं संदेहा , वह नर आई माघ कर सेवा ।
जनम मरण मुक्तन इहँ पाई , यही भूमि अतुलित हरषाई ।।

यही प्रयाग भूमी सुखदाई , वेद पुराण सबहि यह गाई ।
जो नर बसत प्रयाग-प्रयागा ,वह नर राम अनुज अनुरागा ।।

गावहि यहीं सब नर सुर संता , वेद पुराण यहां भगवंता ।
माघ माह भर सब सुर आवहिं , त्रिवेणी में सुखद नहावहिं ।।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, January 14, 2018

माघ मेला(चौपाई)

A poem of Umesh chandra srivastava 

गंगा-जमुना-सरस्वती तीरा , जो नर बसहिं पाये भव हीरा। 
राम अनुज संग भार्या आये , भारद्वाज मुनि अति हरषाये।।

यही प्रयाग की अतुलित भूमी , जुगत करत सब आवहि झूमी। 
यह पुनीत माह सुखद सुहावा , आवहुँ इहाँ-नाहीं पछतावा।। 

जे नर माघ मकर मह आयी , सो समझो जग में सुख पायी। 
कवन-कवन मैं वर्णन करहूँ , सीता राम अनुज इहँ रहियउं।।  (क्रमशः कल )



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...