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Saturday, May 13, 2017

चाँद चांदनी

poem by Umesh chandra srivastava 


चाँद चांदनी को,
देख रहे हो।
तुमसे ही है ,
पर न जाने क्यों ,
तुमसे अधिक खिला है। 
मिलन की मधुरतम बेला में ,
तुम्हारे आगोश में ,
समाहित होने के लिए। 
लगता है-आज वह ,
बेचैन है। 
तुम खामोश सिकुड़ते जा रहे हो,
ज़रा देखो तो सही ,
चांदनी की व्यथा ,
समझो तो सही। 
क्यों मौन हो ?
बोलो - कुछ तो बोलो ,
अपने मुख ललाट की ,
वह अप्रतिम छवि ,
आज कुछ तो खोलो ,
 कुछ तो खोलो। 





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 



Friday, May 12, 2017

ओ पाखी ,पाखी

poem by Umesh chandra srivastava

नयन तुम्हारे बेमिसाल ,ओ पाखी ,पाखी।
इसमें मिले है खुमार ,ओ पाखी ,पाखी।
नयनों का विचित्र है भाव,ओ पाखी ,पाखी।
इसमें ममता ,दुलार ,ओ पाखी ,पाखी।
इसमें है प्रेम-इज़हार ,ओ पाखी ,पाखी।
खोये-खोये क्यों हैं आज ,ओ पाखी ,पाखी।
कुछ तो करो ऐतबार ,ओ पाखी ,पाखी।
कहाँ गयी तुम गुलज़ार ,ओ पाखी ,पाखी।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Thursday, May 11, 2017

आज पाती आ गयी

poem by Umesh chandra srivastava


आज पाती आ गयी -उसमें लिखा।
चल पड़ो उस ओर-तुमने क्या किया ?
सब वसूलों का यहाँ हिसाब दो।
उस नियंता के समक्ष सुविचार दो।
पूछेगा-जीवन में तुमने क्या किया ?
कितनों को सन्मार्ग तुमने है दिया।
तब बताओ क्या कहोगे तुम भला।
इसलिए सुविचार जीवन की कला।
और इसमें ही रमों आगे बढ़ो।
सब मिलेगा जिस लिए जीवन मिला।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Friday, May 5, 2017

माँ का रूप तो चंदा-सूरज

poem by Umesh chandra srivastava 

माँ का रूप तो चंदा-सूरज , 
माँ की गोद तो धरती है।
माँ का प्रेम गगन सा ऊँचा ,
माँ की सोच पातालपुरी। 
माँ का दूध अमर अमृत है ,
माँ की गोद बसंत ऋतु। 
माँ का दर्पण मुख-खुब सुन्दर-
उसमें जो चाहो देखो। 
माँ का प्रेम दुलार हमेशा-
बच्चों में स्फूर्ति भरे। 
माँ के चलते बच्चा बढ़ता-
जग में नाम करे रोशन।
माँ ही तो वह समय-वमय है ,
बच्चों की हितकारक माँ। 
माँ से ही सब सपने खिलते,
माँ से ही सब रीति-रिवाज। 
माँ बिन जग में कुछ भी नहीं है,
माँ ही जीवन का सरगम।
माँ तो गीत-संगीत वही है ,
माँ ही कविता की पतवार। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Tuesday, May 2, 2017

तुमको तो क्या कहें हम



तुमको तो क्या कहें हम ,
तुम बेहिसाब हो।
रातों को जागते हो ,
दिन में विराम है।
संतों की यही बाणी,
भोर में राम है।
रातों के गहरुएपन ,
कि क्या मिसाल है।
तुमने तो पढ़ा गीता -
न कोई किताब को।
बस धुन में जीते अपने ,
तुम क्या हिसाब हो ?
गैरों पे करम करते ,
अपनों को त्याग तुम।
लाइक में रात होते ,
गैरों से बात खूब।
अपनों से मुँह छिपाते ,
तुम्हें क्या मिसाल दें।
क्या इस तरह से जीवन ,
संगत में बनेगा।
क्या होगा अब तुम्हारा ,
तुम तो तबाब हो।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Monday, May 1, 2017

तीन बिम्ब

poem by Umesh chandra srivastava

                              [१]
ज़रा लब को तो खोलो ,प्यार से दो बात कर लो तुम।
पुरानी रंजिशों को छोड़ ,कुछ सौगात कर लो तुम।
नहीं तुम हमसे मत बोलो-ज़रा इस ओर तो देखो।
सुनाई देगा जीवन में ,वही किस्सा पुराना है।
                           
                              [२]
अगर में 'औ' मगर में ,ज़िंदगी को क्यों गंवाते हो।
चलेंगे साथ का दावा ,ज़रा पैबंद तो खोलो।
ज़रा सी आँधियों में तुम यू हीं सिमटे ,हो रूठे हो।
ये जीवन कंटकों का जाल इसको पार कर लो तुम।

                              [३]
दवा का क्या असर होता ,तुम तो डाक्टर ठहरे।
अगर नासूर हो जाए ,बताओ क्या करें तब हम।
फ़क़त एक बात को बांधे हुए तुम रूठ के बैठे।
इशारों में अगर समझो तुम्हीं तो यार हो अपने।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Sunday, April 30, 2017

मैं हूँ पाखी ,समझ रहे हो क्या

poem by Umesh chandra srivastava

मैं हूँ पाखी ,समझ रहे हो क्या ,
तुम तो भंवर-पतिंगा हो।
मत मँडराओ पास हमारे ,
जल-बर कर रह जाओगे।
मैं तो दीप हूँ ,
मेरे लौ से दूर रहो।
तुम  तो ठहरे दीवाने ,
डोल-डोल बस घूर रहे।
काम-वाम है कोई नहीं क्या ?
हर दम आके डट  जाते हो।
राहो में मेरे झुरमुट सा ,
आकर बस तुम , बस ,बस जाते हो।
मैं क्या कोई छुई-मुई हूँ ,
जो तेरी आहट से सूख जाऊं।
अपनी दृष्टि क्या रखते ?
देख-देख क्या पा जाओगे !
भंवर पतिंगे सा जीवन ,
क्यों अपनाना चाहते हो।
मन में कोई और भाव नहीं है क्या ?
एक भाव से हरदम चुस्त।
फौलादी हो ,कुछ करो ,
देश हित में कुछ बरो।
दूजी दुनिया की यह रंगत ,
स्वयं पास आ जायेगी।
फिर तुम देखो-जी भर के ,
दृष्टि पसारो-परस करो।
नेक दृष्टि रख आगे बढ़ो तुम ,
तुम पर यही भाव मेरा।
छोड़ो पीछा ,जाओ हट कर ,
सही मार्ग कुछ अपनाओ।
अपना भी हित कुछ कर लो तुम ,
और देश-समाज का भी।
 वरना तुम जाओगे वहां ,
'पास्को' लगेगा ऊपर से ,
रगड़- रगड़ खप जाओगे।
         मैं हूँ पाखी ,समझ रहे हो क्या।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Saturday, April 29, 2017

राम की शक्ति माता तुम्हीं तो बनी

poem by Umesh chandra srivastava

राम की शक्ति माता तुम्हीं तो बनी ,
राम असहज हुए तो पुकारा तुम्हें। 

राक्षसों की तो माया बिकट थी बिकट ,
तेरे चरणों से उनका ही मर्दन हुआ। 

तेरे नामों का सुमिरन ,मनन जो करे ,
फिर वह जग में रहे मुक्त प्राणी तरह। 

कोई झंझट व संकट में वो न पड़े ,
माँ तू ही है सुखों की अमर रागनी। 

तेरा दर्शन 'औ' पर्शन सभी चाहते ,
माँ जगत की तू ही है तो शक्ति घनी। 

तेरे आँचल में जन-मन सुखी से रहें ,
राम की तू आराधन तुम्हें पूजते। 



 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava

Friday, April 28, 2017

सोचता हूँ

poem by Umesh chandra srivastava

सोचता हूँ ,सबको ले के चलूँ ,
घर ,परिवार ,साथी-संघाती सबको।
पर  फिर  ठिठक जाता हूँ ,
सबकी-अपनी सोच ,
अपना दायरा ,
अपना अनुभव ,
बातें तो वह -उसी हिसाब से करेंगे ,
मेरे मन को भाये ,
न भाये -ऐसे में ,
मैं सोचता हूँ ,
अपने विचार को मानूँ।
लेकिन लहू का संस्कार ,
क्या इसकी इज़ाज़त देगा ?
देगा -सोचता हूँ ,
ज़रूर देगा ,
मगर थोड़ा विद्रोही होने पर।
आखिर यही तो ,
किया भारतेन्दु जी ने।
भाई ने हिस्सा बटा लिया।
सोचिये -उनसा ,
उनसा संकल्पित होइए ,
तब बनेगी बात सब।
तब रच पाएंगे ,
साहित्य का नया वितान।
तब आप भी ललकारें !
शपथ लें ,मुकरें नहीं ,
अडिग रहें -साहसी योद्धा की तरह।
क्योंकि -साहसी योद्धा ही ,
बनाता है ,
संवारता है ,
प्रेरणा देता है।
संकल्प कीजिये ,
तो आ जाइये ,
संकल्प लें, और ,
चल पड़ें ,
उसी राह पर ,
जहां अपनी ज़मीन हो ,
अपना आसमान हो ,
और सिर्फ ,
अपने सपनों की हक़ीक़त हो।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Thursday, April 27, 2017

तुमसे नयन लड़ी जो प्रियतम

poem by Umesh chandra srivastava 

तुमसे नयन लड़ी जो प्रियतम ,
नयनों में मधुमास हुआ। 

इधर-उधर अब मत भटकाओ ,
अबतो कुछ अहसास हुआ। 

नहीं पता था प्रियतम तेरे ,
नयनों में इतना रास है। 

बाग़ -बाग़  सब उपवन हो गए ,
उहा-पोह में साँस हुआ। 

कहो बताओ किधर चले हम ,
पंथ यहाँ से जाते अनेक। 

किस पथ पर हम चलें बताओ ,
मन एकदम संत्रास हुआ। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Tuesday, April 25, 2017

बड़ी खूबसूरत हैं आँखें तुम्हारी

poem by Umesh chandra srivastava

बड़ी खूबसूरत हैं आँखें तुम्हारी ,
जहां भर की दिखती है इशरत इसी में। 
निगाहों का पैना वह पन है सुहाना ,
गिराकर ,उठाकर हो करती दीवाना। 
ज़रा होश में तो  रहो मेरी जाना ,
नहीं हमको करना मदहोशी ज़माना। 
बड़े तो सितमगर यहाँ लोग बैठे ,
नहीं कुछ मिलेगा तो तोहमत लगाना। 
मुझे फ़िक्र तेरी तुझे खुद की न हो ,
मगर मैंने जाना यह ज़ालिम ज़माना। 
कहाँ यह बना दे , कहाँ यह दिखा दे ,
तुम्हें भी तो रुसवा ये शूली चढ़ा दे। 
नहीं इसको भाता युगल प्रेम कोई ,
कहाँ इसको फुर्सत ये समझे तुम्हें भी। 
इसे बस ये आता नहीं है रहम भी ,
यह फरमान देकर करेगा बेगाना। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...