month vise

Thursday, July 27, 2017

दो मुक्तक

Umesh chandra srivastava's poem

                  (1)
शब्द को कुछ अर्थमय विस्तार दो,
बिम्ब में भावों का बस संचार दो।
वह नियंता है स्वयं ही रच रहा,
बात के उसके ही बस गति सार दो।

                    (2)
चार पहर से सोच रहा था, तुम भी आओ तोता-मैना,
बरबस निरस-निरस मन होता, तुम ही खिल जाओ तोता-मैना।
 चाँद चकोरी बिरहन तडपे, मत भरमाओ तोता-मैना,
आप तो सहज-सहज रहने दो, तुम भी आओ तोता मैना





उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
Umesh chandra srivastava's poem 

Tuesday, July 25, 2017

माँ की दुआ

Umesh srivastava's poem

सुखद चंदिनी की मगन रात थी वह,
छिटकते संवरते बदल हो रहे थे।
थी मध्यम सी पीड़ा- मगर मन में हर्षित,
निहारे पड़ी थी वह निज लाल को बस।
वह कहती चमकता सा जीवन हुआ है,
चमन में कमलदल खिला है खिला है।
सुखद जोग है यह ललन को लिए मैं,
हूँ हर्षित, मैं पुलकित मगन हो रही हूँ।
यही कल खिलायेगा जीवन की नदियां,
धरा पर बनाएगा अपना स्वयं पथ।
यही मैं दुआ दे रही हूँ तुम जाओ,
चमन में हसो अपना बादल बनाओ।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव-  

Umesh srivastava's poem 

Thursday, July 20, 2017

राष्ट्र के नाम ,नए महामहिम को



हे श्रेष्ठ नमन ,श्रद्धा-पूजा-अर्पण ,
पुष्पों का सुन्दर हार लिए।
है नमन श्रेष्ठ भारत सूत को ,
भावों का पुष्प पराग लिए।

गौरव भारत पर होता है ,
जब आते ऐसे पुण्य पुरुष।
नित नूतन भव्य विचार लिए ,
भारत का गौरव मान लिए।

हिम चोटी उत्तम शिखर बढ़े ,
नदियों में स्वच्छता और बढ़े।
मानव में प्रेम-सहिष्णु बढ़े ,
जीवन में सुगमता आ जाये।

नव चेतन मन हो स्वच्छ-स्वच्छ ,
उसमें किसलय अनुराग बढ़े।
समतल भू-भाग हों हरे-भरे ,
उसमें बीजों का हार बढ़े।

आओ मिलजुल भारत वासी ,
अमनों के प्रति अनुराग बढे।
नैतिकता नूतन सजग तने ,
मनुजों में नव्या विचार बढ़े।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, July 9, 2017

मेरे जीजा तेरे चरणों में

poem of Umesh chandra srivastava

(50वीं शादी के सालगिरह की पवन बेला पर)

भावों के पुष्प चढ़ाऊंगा , मेरे जीजा तेरे चरणों में ,
रिश्ता नाते दुलराउंगा , मेरे जीजा तेरे चरणों में।

तुम जब बोले-सच्चा बोले , सच्चा तो कड़ुवा होता है ,
कुछ को भाता , कुछ तुनुक जाते , मेरे जीजा तेरे चरणों में।

आदर बहु है सम्मान बहुत ,ह्रदय से बातें करता हूँ ,
जो योग्य रहा ,मंजूर करो , मेरे जीजा तेरे चरणों में।

आशा की पुलकित छाँव में , बादल के सुनहरे गांवों में ,
तुम चिरजीवी बनकर फैलो , मेरे जीजा तेरे चरणों में।

कुछ श्वेत पत्र जीवन में भी-जीवन को रसासिक्त करते ,
आगंतुक सब चेहरे-मोहरे , मेरे जीजा तेरे चरणों में।

जो भी बीता सब अच्छा था , शिकवे की बहारें कभी न हों ,
सच्चा जीवन आगे भी हो , मेरे जीजा तेरे चरणों में।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, July 7, 2017

गीत गाता हूँ ,तुम मुस्कराती रहो


गीत गाता हूँ ,तुम मुस्कराती रहो ,
भाई-बहनों का प्रेम, बढाती रहो।
जो तुम्हारी हुईं दुहिता -तुम तो ऐ ,
उनको आशीर्वचन से लुभाती रहो।

कौन कब है यहां ,कौन जाता कहाँ ,
सुख के सागर में गोता लगाती रहो।
वो मिले तुमको-उनको ही चंदा समझ ,
सुख की सुन्दर बयारें चलाती रहो।

आज वो है बेला-तुमको कहता हूँ मैं ,
ज़िंदगी में अमर प्रेम गाती रहो।
सुख की बगिया खिले-प्रेम-ही-प्रेम हो ,
प्रेम के ही चमन में नहाती रहो।

बाल बच्चे , जो नाती 'औ' पोता हुए ,
तेरे आँचल में सारे पगे हैं , बढ़े।
जमाताओं को खुश कर-सदा प्रेम दो ,
सारे मायके वालों को मिलाती रहो।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Thursday, June 22, 2017

कृषक

poem by Umesh chandra srivastava 


                       <1>

हे कृषक तुम्हारा पूजन कर ,
श्रद्धा के पुष्प चढ़ाएंगे।
सत्ता के लोलुप सारे तो ,
तेरी आहाट पहचानेंगे।
निर्भीक रहो ,तुम मौन नहीं ,
निज हक़ के खातिर डट जाओ।
ये धुनी रमाये बैठे जो -
उनको ललकारो ,फटकारो।
सत्ता के सारे बनिया ये ,
तेरे चरणों में झुकेंगे।
बस अपनी ताकत ,
गौरव तुम -
इनको दिखलाओ ,
जहाँ भी हों।
माना जीवन तो अन्नो बल ,
चलता है ,चलता जाएगा।
तुम अन्न देवता वसुधा के ,
तुमको नतमस्तक है प्रणाम।

                       <2>

बिखरे तुम रहते -आये हो,
यह लोकतंत्र है जानो तुम !
बच्चा भी जब चिल्लाता है ,
तब माँ देती है दूध उसे।
तुम भी गर्जन-तर्जन करके ,
अपने अधिकार को मांगों तो।
ये भयाक्रान्त सत्ता धारी ,
भय खाएंगे 'औ' देंगे तुम्हें।
बस हक़ के खातिर डटे रहो ,
ये बात तुम्हारी मानेंगे।
          तुम अन्न देवता वसुधा के ,
          तुमको नतमस्तक है प्रणाम।







उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Monday, June 19, 2017

राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां



राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां ,
राम तो हैं रमें ,राममय है जहाँ।
सीता सुन्दर ,लखन भ्रात अद्भुत यहां ,
शत्रुघन की कला , प्रेम अद्भुत रहा।
'औ' भरत की तो बातें न पूछो कभी ,
वह हैं द्रष्टा उन्होंने रचा राम मय।
     राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां।

वाह रे! दशरथ ,कौशल्या ,सुमित्रा यहाँ ,
कैकेई की कला राम ने खूब कही।
उनको माता की श्रेष्ठतम उपाधि दयी ,
राम ही हैं रमे राममय है जहां।
उनका कर्त्तव्य कितना ही सुन्दर रहा ,
बाल्मीकी ने राम को मानव कहा।
तुलसी बाबा ने उनको है ब्रह्म रचा ,
श्रेष्ठ हैं मैथिलि जिनकी साकेत है।
उसमें उर्मिल 'औ' लक्ष्मण का अद्भुत मिला,
उस बहाने उन्होंने रचा ग्रंथ यह।
राम का काव्य सुन्दर, सुहावन यहां।






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, June 16, 2017

शीघ्र आ जाओ प्रिये

poem by Umesh chandra srivqastava 

शीघ्र आ जाओ प्रिये,
स्वागत तुम्हारा हम करें। 
ह्रदय स्थल में जो व्यापित ,
ताप को कुछ काम करें। 

वैसे फुर्सत कहाँ तुमको ,
काम की धुन में रमें। 
तेरे आने से मनों का,
भाव का पुट कम करें। 

तुम तो आते ही , ठहरते ,
हो कहाँ -इस वृष्टि में। 
दृष्टि से अवलोक करके ,
फुर्र हो जाते भले। 

पर समय जो तेरे आने से ,
हुआ निमग्न जो। 
उसको रूपों में बसाकर ,
आस की  डोरी धरें । 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivqastava 

Friday, June 2, 2017

बढ़ो धरा के अमर सपूतों-1

poem by Umesh chandra srivastava 

बढ़ो धरा के अमर सपूतों ,
युग फिर तुमसे मांगे है। 
भ्रष्ट तंत्र जो व्याप्त हुआ है ,
उसको तुम्हें हटाना है। 

कुर्सी पर बैठे जो बंधू ,
देश का सौदा करते हैं। 
अपने हित की बात वो करते ,
जनता को बहकाते हैं। 

बन जायेगा राम जो मंदिर ,
राम राज्य क्या आएगा !
रामायण घर-घर में वाचन ,
पर परिवर्तन आया क्या ?

वह जो मानस बने प्रवक्ता ,
उनको भी मुद्दा चहिये। 
कहिये बात सत्य नहीं है !
वह भी तो हैं रंगे हुए। (जारी कल )



 

उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Thursday, June 1, 2017

मैं हूँ

poem by Umesh chandra srivastava

जब हमारे पास,
कुछ भी नहीं था ,
तब तुम थे।

आज हमारे पास ,
सब कुछ है ,
पर तुम नहीं हो।
बस यादें हैं ,
धड़कन है ,
और मैं हूँ।

मुझे याद है ,
जब तुम सोते में ,
मुझे जगा देते।
और अपने बाँहों का ,
फूलहार डाल,
मुझसे बतियाते ,
पुचकारते ,दुलारते ,
और प्यार करते।
कितना अच्छा लगता।
पर आज कहाँ रहा ,
वह सब।
जो तुम्हारे होने से ,
होता था।

अब कहाँ रही ,
वह प्रेम की टीस ,
जो तुम्हारे होने से ,
खिल उठता था।
अब तो पतझड़ है ,
अंगड़ाई है ,
देहं है ,
और मैं हूँ।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -










काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...