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Saturday, April 6, 2019

शैल सुता माँ तुम्हें प्रणाम


A poem of Umesh chandra srivastava

माँ के चरणों में है वंदन,
शैल सुता माँ तुम्हें प्रणाम |
नमन तुम्हारा हरदम कर लें,
ऐसा माँ दो तुम वरदान |
तेरी महिमा जग भर गाये ,
तू कारा को दूर करे |
मन से कलुषित भाव मिटा के ,
उसमे तू नवरस भर दे |





उमेश चन्द्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, March 23, 2019

अबकी होली में कोई रंगो की बरसात न हुई

A poem of Umesh chandra srivastava



अबकी होली में कोई रंगो की  बरसात न हुई,
अबकी होली में कोई मधुर सी सौगात न हुई।

वह दिन और थे जब रंग में रंगे हम रहते ,
गुझिया, पापड़ 'औ' समोसे को तल-तल रखते।

अब हम हैं और हमारे संघी साथी ,
वक्त का दौर है अब कोई नहीं बाराती।

अब तो आएंगे बहुत सधे हुए मेहमाँ भी ,
चाय वह फीकी और नमकीन थोड़ा लेंगे ही।

बहुत उम्मीद की होली है और बोली भी ,
अबकी होली में कोई सावन सी बरसात न हुई।  




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, March 20, 2019

होली

A poem of Umesh chandra srivastava



होली रंग अबीर का ,
प्रेम मिलान त्यौहार।
आपस में हम बैठ के ,
बाटें यह व्यवहार।

होली के रंग में रंगे ,
सड़क गली मैदान।
सब में दिखे एक रंग,
मस्ती में हुड़दंग ।

प्रेमी के संग प्रेम का ,
संघी के संग दंग।
होली में जब हम मिलें ,
देखो फिर तो भंग।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, March 16, 2019

हे भारत के भाग्य विधाता

A poem of  Umesh chandra srivatava


यह अवसर जाने न पाए ,
लोकतंत्र का पर्व है आया।
अपने  वोटों की कीमत का ,
बड़ा सुनहरा अवसर आया।

किसको वोट करेंगे हम सब ,
इसपर जम कर मंथन करलो ।
लेकिन वोट अवश्य ही देना,
हे भारत के भाग्य विधाता।




 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of  Umesh chandra srivatava 

Friday, March 8, 2019

देवी नहीं , भारत की नारी

A poem of Umesh chandra srivastava



देवी नहीं , भारत की नारी ,
पतवार बनो तुम सुलभ दुलारी।
जग को तुम पर नाज़ है।
भारत की गौरव गाथा तुम।
अपना देश महान है।


सदा परीक्षा से गुज़री तुम ,
सीता , सती , सावित्री तुम।
तुम भारत की वीर सपूती ,
तुम पर सब कुरबान है।

सदा-सदा से लाज बचाया ,
सदा-सदा संघर्ष करो।
हम सब वीर सपूत जहां के ,
तुम पर सबको नाज़ है।

सुलभ दृष्टि, ममता की छाया,
पुत्री, माँ, बहना हो तुम।
कर्मावती, दुर्गावती तुम हो ,
तुम पर सब बलिदान है। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, March 3, 2019

एक बार शिव सपने आये

 A poem of Umesh vhandra srivastava



एक बार शिव सपने आये ,
कहन लगे मन अति हरषाये।
जग के मानव क्यों अकुलाये ,
मानव हित सब काम करे वह।
लोभ मोह से मुक्त रहे सब ,
यही भाव हमको सरसाये ।
           एक बार शिव सपने आये।

लोक विराग को त्याग सभी जन ,
मानव से अनुराग बढाए ।
पशु-पक्षी-सब जीव जंतु को ,
अपने वह परिवार में लाये ।
           एक बार शिव सपने आये।

लोक की बातें लोक में होवे ,
देवलोक की देवलोक में।
मत इस भ्रम में लोक समायें ,
अपना काम वह करते जाएँ।
           एक बार शिव सपने आये।



उमेश  चंद्र श्रीवास्तव -
 A poem of Umesh vhandra srivastava 

Saturday, February 16, 2019

गंगा


A poem of Umesh chandra srivastava 

गंगा की धारा में,
प्रेम-प्रेम-प्रेम भरा ,
जो भी नहाये मिलती है मुक्ति |
भगीरथ का प्रयास,
निश्चल निष्काम था,
गंगा नहाए तो मिलती है मुक्ति |
गंगा शिव का प्रसाद,
मिटता सारा अवसाद,
जो भी तट आये मिलती है जुगति |
जीवन अनमोल रहा,
इसका नहीं तौल रहा,
जीवन का अंतिम तट, गंगा से मुक्ति |





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, February 11, 2019

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान

A poem of Umesh chandra srivastava

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान,
यही हमारी है पहचान । 
दूर-देश से जो भी आये ,
वह सब यहं पर हैं मेहमान।

'हिन्द' शब्द संस्कृत का 'सिंधु'
'सिंधु' सिंध नदी में बिहँसा।
आस-पास सिंधु भूमि है ,
यही शब्द ईरानी में जाकर ,
'हिन्दू ' 'औ' 'हिन्दू' कहलाया।
इसका मायने 'सिंध प्रदेश',
धीरे-धीरे ईरानी भी ,
भारत भू भाग को जाने ,
इसी शब्द का अर्थ विस्तार।
हिन्द शब्द भारत हार।

इसी ईरानी का 'ईकं' प्रत्यय ,
'हिन्दीक' बना अर्थ है 'हिन्द' का ,
यूनानी का शब्द 'हिंदीका',
अंग्रेजी में बना 'इंडिया'।

आदि 'हिन्दीक', का विकसित रूप ,
'हिंदी' भी 'हिन्दीक' परिवर्तित।
इसका मूल अर्थ 'हिंदीका' ,
विश्लेषण है किन्तु बाद में ,
भाषा के अर्थों में संज्ञा ,
बना रचा 'औ' हो गया हिंदी।

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान,
यही हमारी है पहचान । 
दूर-देश से जो भी आये ,
वह सब यहं पर हैं मेहमान।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Friday, January 18, 2019

होना मेरा

A poem of Umesh chandra srivastava 

होना मेरा ,
घर का कोना-कोना ,
बतलाता है। 
न होना भी ,
घर का कोना-कोना ,
दिखलाता है। 
मेरे होने से ही ,
घर का द्वार-द्वार चमकता ,
न होने पे ,
पूरा का पूरा ,
घर अखर जाता है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, January 9, 2019

बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही है माँ




बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही है माँ ,
जंजाल सारे सफर की, हांफती है माँ। 
किसे कहे वह बात-हमसफर भी नहीं है ,
पुत्रों की बात कौन करे ?
अपने में रमे हैं। 
किस्सा नहीं, कहानी नहीं,
यह सत्य बात है। 
सदियों से यही झेल रही ,
हम सभी की माँ। 
बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही माँ। 



Tuesday, January 8, 2019

धूप आयी, मैं हूँ बैठा


A poem of Umesh chandra srivastava 

धूप आयी, मैं हूँ बैठा,
अंचलों में खुद हूँ ऐठा। 
मुखर उद्गण ताकते, घनघोर से,
क्या सवेरा, प्रातः का अवलोक कर लो। 
दिवस का तो ताप चढ़ता जा रहा है,
रात का शीतल पवन भी आ रहा है। 
क्या यही जीवन नहीं, कुछ तुम तो बोलो,
क्यों अधर सीकर पड़े हो, मुख तो खोलो। 
रात की है मौन वाणी-खेल चलता,
पर दिवस में बोलियों का मेल चलता। 
रात-दिन के ताप का परिमाप कर लो,
जिंदगी के छोर का अनुमान कर लो। 
बस हवस में, मत बिताओ ज़िन्दगानी,
ठहरो देखो-वहां पर उपकार बानी। 
इस जगत का सत्य जानो बस वही है,
ज़िन्दगी की यह कहानी बस सही है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...