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Sunday, March 3, 2019

एक बार शिव सपने आये

 A poem of Umesh vhandra srivastava



एक बार शिव सपने आये ,
कहन लगे मन अति हरषाये।
जग के मानव क्यों अकुलाये ,
मानव हित सब काम करे वह।
लोभ मोह से मुक्त रहे सब ,
यही भाव हमको सरसाये ।
           एक बार शिव सपने आये।

लोक विराग को त्याग सभी जन ,
मानव से अनुराग बढाए ।
पशु-पक्षी-सब जीव जंतु को ,
अपने वह परिवार में लाये ।
           एक बार शिव सपने आये।

लोक की बातें लोक में होवे ,
देवलोक की देवलोक में।
मत इस भ्रम में लोक समायें ,
अपना काम वह करते जाएँ।
           एक बार शिव सपने आये।



उमेश  चंद्र श्रीवास्तव -
 A poem of Umesh vhandra srivastava 

Saturday, February 16, 2019

गंगा


A poem of Umesh chandra srivastava 

गंगा की धारा में,
प्रेम-प्रेम-प्रेम भरा ,
जो भी नहाये मिलती है मुक्ति |
भगीरथ का प्रयास,
निश्चल निष्काम था,
गंगा नहाए तो मिलती है मुक्ति |
गंगा शिव का प्रसाद,
मिटता सारा अवसाद,
जो भी तट आये मिलती है जुगति |
जीवन अनमोल रहा,
इसका नहीं तौल रहा,
जीवन का अंतिम तट, गंगा से मुक्ति |





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, February 11, 2019

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान

A poem of Umesh chandra srivastava

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान,
यही हमारी है पहचान । 
दूर-देश से जो भी आये ,
वह सब यहं पर हैं मेहमान।

'हिन्द' शब्द संस्कृत का 'सिंधु'
'सिंधु' सिंध नदी में बिहँसा।
आस-पास सिंधु भूमि है ,
यही शब्द ईरानी में जाकर ,
'हिन्दू ' 'औ' 'हिन्दू' कहलाया।
इसका मायने 'सिंध प्रदेश',
धीरे-धीरे ईरानी भी ,
भारत भू भाग को जाने ,
इसी शब्द का अर्थ विस्तार।
हिन्द शब्द भारत हार।

इसी ईरानी का 'ईकं' प्रत्यय ,
'हिन्दीक' बना अर्थ है 'हिन्द' का ,
यूनानी का शब्द 'हिंदीका',
अंग्रेजी में बना 'इंडिया'।

आदि 'हिन्दीक', का विकसित रूप ,
'हिंदी' भी 'हिन्दीक' परिवर्तित।
इसका मूल अर्थ 'हिंदीका' ,
विश्लेषण है किन्तु बाद में ,
भाषा के अर्थों में संज्ञा ,
बना रचा 'औ' हो गया हिंदी।

हिंदी, हिन्दू , हिंदुस्तान,
यही हमारी है पहचान । 
दूर-देश से जो भी आये ,
वह सब यहं पर हैं मेहमान।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Friday, January 18, 2019

होना मेरा

A poem of Umesh chandra srivastava 

होना मेरा ,
घर का कोना-कोना ,
बतलाता है। 
न होना भी ,
घर का कोना-कोना ,
दिखलाता है। 
मेरे होने से ही ,
घर का द्वार-द्वार चमकता ,
न होने पे ,
पूरा का पूरा ,
घर अखर जाता है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, January 9, 2019

बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही है माँ




बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही है माँ ,
जंजाल सारे सफर की, हांफती है माँ। 
किसे कहे वह बात-हमसफर भी नहीं है ,
पुत्रों की बात कौन करे ?
अपने में रमे हैं। 
किस्सा नहीं, कहानी नहीं,
यह सत्य बात है। 
सदियों से यही झेल रही ,
हम सभी की माँ। 
बिस्तर पे पड़ी खांसती ही जा रही माँ। 



Tuesday, January 8, 2019

धूप आयी, मैं हूँ बैठा


A poem of Umesh chandra srivastava 

धूप आयी, मैं हूँ बैठा,
अंचलों में खुद हूँ ऐठा। 
मुखर उद्गण ताकते, घनघोर से,
क्या सवेरा, प्रातः का अवलोक कर लो। 
दिवस का तो ताप चढ़ता जा रहा है,
रात का शीतल पवन भी आ रहा है। 
क्या यही जीवन नहीं, कुछ तुम तो बोलो,
क्यों अधर सीकर पड़े हो, मुख तो खोलो। 
रात की है मौन वाणी-खेल चलता,
पर दिवस में बोलियों का मेल चलता। 
रात-दिन के ताप का परिमाप कर लो,
जिंदगी के छोर का अनुमान कर लो। 
बस हवस में, मत बिताओ ज़िन्दगानी,
ठहरो देखो-वहां पर उपकार बानी। 
इस जगत का सत्य जानो बस वही है,
ज़िन्दगी की यह कहानी बस सही है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, December 31, 2018

नया वर्ष सावन होगा

A poem of Umesh chandra srivastava

बीता वर्ष सुखद पावन था,
नया वर्ष सावन होगा।
मिथकों की न डोर चलेगी,
सत्य युक्त तन-मन होगा।

भय का सब माहौल गया अब,
निर्भय बन आगे आओ।
कौन दुष्ट है जो यह करता,
उसको मुक्की दिखलाओ।

नव नूतन यह वर्ष हमारा,
सब जन लोग प्रफुल्लित हो।
प्रेम-प्यार का रस खुब बरसे,
पूरा जग अभिसिंचित हो।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Thursday, December 27, 2018

आज तारे झांकते हैं आँख खोले

A poem of Umesh chandra sriavstava


आज तारे झांकते हैं आँख खोले,
मत कहो, जो भी हो करना ,
कर लो हौले।
सृष्टि का नियम-सदा से रात ही है,
कर्म का खिलना सदा से प्रात ही है।
कहो जीवन के सफर में खो गए क्या ?
पा गए कुछ सार्थक सो गए क्या ?
जब भी सोओगे-सदा है ताप बढ़ता,
ज़िन्दगी के छोर में यह समय खलता।
मत रुको, बस चलते जाना ज़िन्दगी है।
एकला पथ पे चलना - बंदगी है।
तुम कहो अनुहार से जीवन सफल है।
मत कहो-बस बीतती यह ज़िन्दगी है।   



उमेश चंद्र श्रीवास्तव-
A poem of Umesh chandra sriavstava 


Friday, December 21, 2018

एक कविता

A poem of Umesh chandra srivastava 


एक पल में बदल जाए ,
संसार यही है। 
कहीं दुःख है ,
कहीं सुख ,
व्यवहार यही है। 
आते हैं लोग ,
'औ' चले जाते हैं यहां ,
जिसका भी कर्म श्रेष्ठ ,
पतवार वही है। 
कुछ लोग निपट जाते ,
अपने में तिर हुए। 
कुछ सरस ही खिल जाते ,
संसार यही है। 
कहने को बाज़ीगर,
खुदा , भगवान यहां पे। 
पर देखा क्या किसी ने ,
संसार यही है। 
जहां झूठ का मुलम्मा ,
दीवार ढही है ,
सच्चे का बोल-बाला ,
संसार यही है। 
 



 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -  
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, November 28, 2018

हरिचरना

A poem of Umesh chandra srivastava

वह जो हरिचरना है ,
मोटा गया है।
खाते-खाते ,
सोटा गया है।

पहले पुरानी पार्टी में था ,
खूब जय बोला ।
लोटा भर-भर नहाया ,
न जाने अब ,
पता नहीं क्यों ?
नई आयी सत्ताधारी पार्टी का ,
कटोरा बन गया है।

हरिचरना की कोई ,
नीति-रीति स्पष्ट नहीं है।
जहां लोटा भरे ,
वही पोखरा चुन लेता है।
मरदजात  , कमबख्त-
अव्वल दर्जे का पैजामा है।

क्या किया जाए ,
अब तो हरिचरना जैसे बहुत हैं ! 
कहाँ-कहाँ डोल ,
थाली पीटा जाये ,
लोटा धारियों की जमात में।




 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, November 17, 2018

यही रंगशाला यही रंगभूमि -2

A poem of Umesh chandra srivastava 

बहुत रूप सागर के गागर में डूबे ,
ये रिश्ते तो एकदम समाये हुए हैं।
खिला गुल जो आंगन , उसी में हैं लिपटे ,
यह जंजाल सारे दिखाए हुए हैं।

मदों में हैं झूमे , सीना तान चलते ,
यह सारे ही रंग बनाये हुए हैं।
यहाँ कौन कैसे रहे , खुब सहे वह ,
सभी भूमिका तो लिखाये हुए हैं।

यहाँ तक कि बातों में माता-पिता को ,
ललन खुब अब तो छकाए हुए हैं।
यहाँ दुःख दलिद्दर सभी तो मिलेंगे ,
यह सारे मुखौटे लगाए हुए हैं।

किया तुमने क्या-क्या बताएंगे सबकुछ ,
यह तेरे जनाज़े में आये हुए  हैं।
यह बस्ती यहाँ पर करो रोल अपना ,
तो सारे कहेंगे जमाये हुए हैं।


क्रमशः... 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...