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Tuesday, July 23, 2019

आज फिर तुमको बुलाना चाहता हूँ

A poem of Umesh chandra srivastava




आज फिर तुमको बुलाना चाहता हूँ ,
आज फिर उस दीप की चाहत मुझे |
रोशनाई में नहा कर प्रेम पूरित ,
आज फिर तुमको दिखाना चाह्ता हूँ |
तुम सदा से पास मेरे ही रही हो ,
तुम सदा से साथ मेरे ही रही हो |
प्रेम का वह राग छेड़ो फिर जरा तुम ,
आज मैं उसमें नहाना चाहता हूँ |



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, July 22, 2019

सावन पावन महीना है

A poem of Umesh chandra srivastava




सावन पावन महीना है ,
इसमें शिव का नगीना है |
भक्तों आओ जरा शिव धाम ,
भोले शंकर बुलाते हैं राम |
शिव की भक्ति है शक्ति अपार ,
श्रद्धा से सब करो नमश्कार |
कितना सुन्दर है लगता धाम ,
साथ बैठी है शक्ति वाम |
        सावन पावन महीना है ,
        इसमें शिव का नगीना है |


उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-

A poem of Umesh chandra srivastava

Saturday, July 20, 2019

तुम्हारे आने से ,


A poem of Umesh chandra srivastava

तुम्हारे आने से,
मौसम बदल जाता है |
तुम्हारे मुस्कुराने से ,
फूल खिल जाते है |
तुम्हारे देखने से ,
सूरज लहलहाने लगता है |
तुम्हारा सुखद सहवास ,
शीतलता प्रदान करता है |
बहुत सोचता हूँ ,
कि तुम्हारे पास,
ऐसा कौन सा ,
गुरुत्वाकर्षण है ,
की सब कुछ ,
खिंचा-खिंचा लगता है |



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

A poem of Umesh chandra srivastava




Thursday, July 18, 2019

अभी तो बहुत काम है


A poem of Umesh chandra srivastava



अभी तो बहुत काम है ,
यहाँ-कहाँ आराम है|
वह तो फिकर में रह रहे ,
खुद वह बढे , खुद को गढे। 
मेरा तो बस मिजाज है ,
वह ही बढे , वह ही चढे। 

इस ज़िन्दगी के मायने ,
समझो कहाँ विराम है। 
अभी तो बहुत काम है ,
यहाँ कहाँ आराम है। 


उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-

Thursday, July 11, 2019

चंदा नहीं मोबाइल चाहिए

A poem of Umesh chandra srivastava




चंदा नहीं मोबाइल चाहिए ,
नन्हा बच्चा बोल रहा है।
पापा मुझको तुरंत दिलाओ,
भाव को अपने खोल रहा है।

मोबाइल में दुनिया भर की ,
खुब तस्वीरें देखूंगा।
मम्मी-पापा सुनलो मेरी ,
मैं भी उसमे फेकूंगा।

देख रहा हूँ रोज तमाशा ,
खिल-बिल सारे मिलते हैं।
एक दूजे को कमेंट लिख रहे ,
सामने कुछ नहीं कहते हैं।

मौन सिखाता यह मोबाईल ,
इसकी दुनिया न्यारी है।
बच्चे बूढ़े सभी जनों को ,
इसकी भाती क्यारी है।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Thursday, July 4, 2019

वह लिखते छंद शास्त्र से,

A poem of Umesh chandra srivastava


वह लिखते छंद शास्त्र से,
परिभाषित करके पढ़ते |
हम तो लिखते जग की बाते,
लोगो को केवल गढ़ते |
वह तो शास्त्र पुरोहित ठहरे,
शास्त्रों के विद्वान प्रबल|
अपनी बातो में रंग भरते ,
दूजे को केवल कहते |



उमेश चन्द्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

निपट अनाड़ी तुम भी सुन लो

A poem of Umesh chandra srivastava



निपट अनाड़ी तुम भी सुन लो
कविता राग विराग सही
भावो का अवगुंठन सारा
यह केवल संवाद नही
अरे जरा कबिरा को देखो
लिखा सहा उस युग का सब
अब तो बानगी पेश कर रहे
उसमे रहना कुछ भी नही ...





उमेश श्रीवास्तव-
A poem of Umesh chandra srivastava 

Monday, June 24, 2019

श्रद्धांजलि


A poem by Umesh chandra srivastava



श्रद्धांजलि सभा में जुटने वाले,
बड़ी निष्ठा से बोल रहे थे|
कि वह कितने- करीब थे उसके,
कितना चाहता था वह- उन्हें|
कितनी बेबाकी से लिखता था,
कबीरा के मंजर का दृष्टांत|
उनकी तमाम कवितायेँ,
मूर्तिभंजक, लोकरंजक,
और न जाने क्या क्या?
उनकी कविताओ में,
संघर्ष, वेदना और स्पृहाएं|
सब कुछ थी|
वह काल के गाल पर,
लिख देता था अटार|
टंकार कर कहता-
करो उसका प्रतिकार,
को हमे डूबोता हो,
समेटता हो|
उसे छोडो,
आगे बढ़ो|
विचारों की क्रांति का,
वह मशाल जलाओ|
जहाँ सारे मानक पुष्ट लगे |
तमान वैचारिक पड़तालों से,
नवाज़ा जा रहा वह|
आज स्मृति के झरोखों से,
निहार रहा था|
आये हुए लोगो की निष्ठां को,
खंगाल रहा था|
कि-कौन-क्या-क्या बहाना कर,
श्रधांजलि सभा से
खिसक रहे थे |
किसी ने किसी बैठक का,
तो किसी ने स्वाथ्य का,
रोना रोया|
और किसी ने कुछ कुछ और का|
अपने-अपने वक्तव्यों के बाद,
वह सब के सब,
फुर्र होते गये|
और अंत तक
श्रधांजलि सभा में,
पचास ये पांच ही रह गये|
जैसे लगा मुखाग्नि के बाद,
अपने ही सिर्फ दस-पंद्रह,
शेष रहते हैं|
बाकी सब वहा से,
 पलायन कर जातें हैं!
ठीक वही नज़ारा,
यहाँ भी था, यहाँ भी था, यहाँ भी था|
उमेश चन्द्र श्रीवास्तव-
A poem by Umesh chandra srivastava


Sunday, June 23, 2019

मिट्टी-मिट्टी सोना उगले

A poem of Umesh chandra srivastava


मिट्टी-मिट्टी सोना उगले,
सोना-सोना मोती।
देश हमरा सर्वश्रेष्ठ है,
काहे को तू सोती।

सोना जीवन का वसूल नहीं,
जगना-जगना भाई।
जागोगे तब ही आगे हो,
बरसाओगे मोती।

अब तो भइया गजब ज़माना,
सत्ता खातिर होती।
लोगों को आपस में भिड़वाके ,
काट रहे हैं गोटी।

आओ देश सँवारे फिर से ,
कहाँ गयी क्यों सोती।
नारी धर्म निभाओ फिर से ,
देश  तुम्हीं से होती।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, June 22, 2019

जब मैं प्रेम में

A poem of  Umesh chandra srivastava

जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
तुम कैसे लगते हो।
कह नहीं सकता ,
बस जी करता ,
है कि तुम-
हममें समां जाओ
या फिर मैं-
तुममे समा जाऊं।
जब मैं प्रेम में
होता हूँ तो ,
लगता है
कि समय कैसे ,
बीत गया।
बेरहम समय ,
कितना क़साई है ,
कि मोहलत ही नहीं देता।
प्रेम तृप्ति हुई नहीं ,
कि समय बीत गया।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
समय को बहुत कोसता हूँ।
जब मैं प्रेम में ,
होता हूँ तो ,
अंदर का,
सारा श्रोता ,
स्रोत बन जाता है।
जब मैं  प्रेम में ,
होता हूँ तो




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of  Umesh chandra srivastava 

Wednesday, June 19, 2019

ऐसी कामना है खंजक

A poem of Umesh chandra srivastava


तुम विकट समय,
अवतरित हुए।
मूर्ति भंजक,
सबके रंजक।
तुम कहाँ गये ,
तुम हो तो बसे ,
सबके मन ह्रदय में-
कमल सदृश्य।
तुम राग-विराग में ,
चूर रहे।
पर लिखा-
बहुत ही दृढ होकर।
कबिरा की वाणी को गाया ,
उनकी वाणी को दोहराया।
गर्जन तेरा सब ,
अमर रहे ,
ऐसी कामना है खंजक।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...