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Tuesday, May 22, 2018

'प्रकृति' कविता संग्रह से - 7

A poem of  Umesh chandra srivastava



अंग-अंग-अंगड़ाई तुम हो ,
मन-मन-मन मनभावन तुम।
नभमंडल की लाली तुम हो ,
तुम्ही मही की हरियाली।

मन के सारे भाव जगाती ,
मन को कर देती हर्षित।
राग-रंग सुख साज तुम्हीं हो ,
तुम ही बन, उपवन , क्यारी।

कहाँ-कहाँ तक बात बताऊं ,
तुम हो तन-मन की लाली।
काले घन सा बादल तुम हो ,
तुम ही रूप की मतवाली।

धड़-धड़-धड़ धड़ाम भी तुम हो ,
तुम हो थर-थर थाती तुम।
हर-हर-हर कर हहरा जाती हो ,
तुम्हीं हो प्यारी , पानी तुम।(धारावाहिक आगे कल )



उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 
A poem of  Umesh chandra srivastava 

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