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Monday, April 24, 2017

हे मानव ,तुम मानसरोवर में ,

poem by Umesh chandra srivastava

हे मानव ,तुम मानसरोवर में ,
विचरण करते रहते।
क्या-क्या देखा नहीं यहां पर ,
विधि का  लेखा सब  कुछ है।

दूर गगन में अंशुमाली ,
धरती पर उजियारी है।
हवा बहे सुन्दर से सुन्दर ,
मौसम में गुलज़ारी है।

अटखेली में बाल-बृंद सब ,
तरुण-अरुण सा डोल रहे।
तरुणाई तो भ्रम ही नहीं है ,
इसमें जो कुछ जोड़ सको।

समझो जीवन का दर्पण यह ,
संकल्पित हो आगे बढ़ो।
गर तुम चुके गरमाई में ,
नयनों के दीदारों में।
सब कुछ चौपट हो जाएगा ,
अरुणित जीवन तब क्या हो ?

जो तुम शब्द चितरक बनके ,
शब्दों के अर्थों में घुल।
मर्मों के सब अर्थ समझ के ,
वैचरिक दृष्टि धरके ,
आओगे तो लोग यहाँ पे ,
चरण बृंद सब चूमेंगे।
          हे मानव ,तुम मानसरोवर में ,
          विचरण करते रहते।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Sunday, April 23, 2017

तुम पर आस लगाए हैं - 2

poem by Umesh chandra srivastava

अब तो सुनवाई है होनी ,
क्यों भृकुटी है तनी हुई।


न्याय व्यवस्था को क्या कहना ,
न्याय व्यवस्था न्यायमयी।
यही देखना है बस आगे ,
क्या निर्णय ,क्या बात हुई।
वैसे तो यह मैटर ठहरा ,
इसपर लिखना दूभर है।
पर सत्य बताना वाजिब ,
सत्य आवरण में खिलता।
सत्यों का अनमोल जगत यह ,
यहां सत्य है सत्यासत्य।
मगर रौशनी में जो दिखता ,
उसमें कुछ परछाईं है।
परछन का यह दौर पुराना ,
परछन जग की थाती है।
इसीलिए इस पर  कुछ कहना ,
परछन का प्रतिघाती है।
लो अब समझो तुम तो ठहरे ,
भावों के खेलन-मेलन।
तुमसे कुछ भी कहना सुनना ,
भावों का भावातुर है।
कुशल चितेरक तुम भावों के ,
भाव-भावना से खेलो।
हम सब सारा सब कुछ सह के ,
तुम पर आस लगाए हैं।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Saturday, April 22, 2017

तुम पर आस लगाए हैं -1

poem by Umesh chandra srivastava 

अब तो सुनवाई है होनी ,
क्यों भृकुटी है तनी हुई। 
जीवन के उस छोर पहर की,
कथा-कहानी खुलना है। 

वह तो एकदम मुखर हो गयीं ,
एकदम से ललकार कहा !
क्यों चेहरे पर शिकन आपके ,
क्या कुछ-कुछ असंगत था !

रमे हुए जो तन-मन भीतर ,
उनको बाहर लाना है। 
जन्मभूमि का राग-वाग सब ,
इस धरती पे बनाना है। 

तब तो थी मुखरित सी वाणी ,
अब खामोशी ओढ़ ,पड़े। 
कानूनों के जिरह चक्र में ,
मंसूबे अब बना रहे। 

देखो अब क्या-क्या कहते हो ,
सत्य एक था -डट जाओ। 
अब पैतर  का खेल न करना ,
कला तुम्हारी यह अनमोल। 

बड़े दुखी अयोध्या वासी ,
जब अतीत में जाते हैं। 
वह था तो कोहराम भयंकर ,
मार्ग-मार्ग पर बंदिश थी। 

नारा गूँज रहा नभ मंडल ,
जेलों में आस्था सैलाब। 
बात पुरानी-विध्वंसन था ,
जायज बात नहीं थी वह। 

सही बताओ सत्य ही कहना !
वहां तो दर्पण होता है !
जो भी दिखाओगे दर्पण में ,
वही फैसला आएगा।  


शेष कल। ....... 
उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Friday, April 21, 2017

आज फिर शाम ढलने को लो गयी

poem by Umesh chandra srivastava

आज फिर शाम ढलने को लो गयी ,
मन का यूंहीं मचलना गज़ब ढा गया। 
मुखड़े पे कुछ शिकन ,कुछ उदासी वह पन ,
वो तो आये नहीं बस गज़ब ढा गया। 
आ के कहती सहेली ज़रा सब्र से ,
उसका यह ही तो कहना गज़ब ढा गया। 
बात करते वह रोज़ - आज ही आएंगे ,
सांझ सूखे का पड़ना गज़ब ढा गया। 
मुस्कुराती रही बाल बच्चों के संग ,
सुत का पूछा यह जाना गज़ब ढा गया। 
रोज़ कहते पिता बस अभी आ गये ,
माँ आंसूं छलकना गज़ब ढा गया। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Thursday, April 20, 2017

गर्मी की यह प्रचंड रवायत

poem by Umesh chandra srivastava


गर्मी की यह प्रचंड रवायत ,
क्या तुमको यह मालूम था।
धरती का यह दहकन होना ,
और हवा में गर्म सा झोका।
लोगों का फिर भी यह कहना,
क्या तुमको यह मालूम था।

दिन दहाड़े बरबस प्रेमी ,
युगलों का गर्मी से तपना।
और बहारें मन में उठना ,
क्या तुमको यह मालूम था।

दिवस पहर का बोझिल होना ,
लोगों का तर-तर कर बहना।
बहना का भाई से कहना ,
क्या तुमको यह मालूम था।

प्रकृति का यह रुख परिवर्तन ,
पर्वत पर बर्फों का पिघलना।
और मही का तपती 'उहं'पन ,
 क्या तुमको यह मालूम था।


 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava

Wednesday, April 19, 2017

प्रेम का काव्य लिखना बहुत चाहता

poem by Umesh chandra srivastava 

प्रेम का काव्य लिखना बहुत चाहता। 
प्रेम की सब कला से मैं महरूम हूँ। 
उसका मुख है कि चंदा नहीं कह सका ,
उसके अधरों का पंखुड़ नहीं सह सका। 
मुस्कुराई तो पूरा जहाँ ही हिला ,
उसको यह भी तो बातें नहीं कह सका। 
       प्रेम का काव्य लिखना बहुत चाहता। 

वह दिवस भोर है या है तेजोपहर ,
उसके रूपों की गर्मीं नहीं सह सका। 
वह मधुर रात है या कि संध्या पहर ,
उसको यह भी तो नाम नहीं दे सका। 
      प्रेम का काव्य लिखना बहुत चाहता। 

बात आयी मिलन की पिछड़ मैं गया ,
दुनियादारी की बातों से भय खा गया। 
वह तो कहती रही राज की बात है ,
पर रज़ाई उलटने से डरता रहा। 
अब कहें क्या उसे सब मेरा दोष है ,
चाहे कुछ भी कहो बल नहीं कर सका। 
      प्रेम का काव्य लिखना बहुत चाहता। 


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Tuesday, April 18, 2017

गीत

poem by Umesh chandra srivastava

बहुत खूब मुखड़ा , सुनैयने हैं नैन  ,
हुआ मैं दीवाना ,बहुत हूँ बेचैन।
तुम चलती तो लगता जहां हिल गया ,
करें बात क्या हम ,नहीं हमको चैन।
हैं बातें बहुत सी ,यह फितरत नहीं ,
मगन हो के नाचूँ ,करूँ क्या सुनैन।
तुम कहती हो ,प्रियतम तुम्हारी हूँ फैन ,
मगर अब कहें क्या ,तुम्हें हम फुनैंन।
अगर पास आओ , तो बातें बनें ,
सुखद हो सफर ,वरना चलने दो बैन।
मगर दिल तो ऐसा-नहीं मानता ,
तुम्हारे लिए ही ,धड़कता तूनैन।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Monday, April 17, 2017

उनसे कहो कि वो तो आके बात तो करें

poem by Umesh chandra srivastava

उनसे कहो कि वो तो आके बात तो करें।
नफरत 'औ' सितम कब तलक , बेज़ार न करें।

माना हुई गलती-जो उन्हें ताना दे दिया।
पर उनने भी हमको-उलहना भी खूब दिया।

दो चार रोज़ साथ रहे , फिर पलट गए।
न जाने कौन गम है , कि वो दूर हो गए।

माना कि कुछ ठहर के-मैं बात से मुकरा।
पर वह तो मुझसे एकदम तकरार कर गए।

अब बहुत हुआ कह दो , वो अब आएं घर मेरे।
वरना मुझे क्या मैं तो दूजा बसाऊंगा।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Sunday, April 16, 2017

आज तुम्हारा रूप पवन है

poem by Umesh chandra srivastava 

आज तुम्हारा रूप पवन है ,
चेहरे पे दमकन भी है। 
जैसे उपवन में खिलवन हो ,
 मौसम में भी सावन है। 

मिलजुल कर इस अमर बेल पर ,
रचना हम तुम कुछ कर लें। 
प्रकृति का अनमोल सदन यह ,
इन सदनों में कुछ हलचल हो। 

चलो वहां सुकुमारित पल में ,
सृष्टि का निर्माण करें। 
हम तुम मिलकर इस सृष्टि का ,
थोड़ा तो विस्तार करें। 




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Saturday, April 15, 2017

नव नूतन यह मार्ग सुखद हो

poem by Umesh chandra srivastava

नये जोड़ों के लिए ,

नव नूतन यह मार्ग सुखद हो ,
नव नूतन व्यवहार रहे।
जीवन में आगे ही बढ़ना ,
यही भाव-विचार रहे।

जीवन की इस सुख बेला में ,
जीवन साथी मिला तुम्हें।
दोनों मिलकर-संयम धर के ,
आगे के सपने बुन लो ।

नए पंथ पर डट ,बढ़ जाओ ,
सब ही मिलेगा-गर एकाग्रित।
जीवन के इस रसिक पहर में ,
अड़चन की कोई डोर न हो।

निर्विवाद से जीवन चलता ,
यही बात मुखरित कर लो।
सब ही खिलेगा-इस पथ पर तो ,
बस एकाग्रित ,लगन धरो।
    नव नूतन यह मार्ग सुखद हो ,
    नव नूतन व्यवहार रहे।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

Friday, April 14, 2017

ज़रा खिलवन्त में आओ

poem by Umesh chnadra srivastava 

ज़रा खिलवन्त में आओ ,
ज़रा दीदार तो कर लें। 
नहीं कुछ मांगता ,
बस प्यार सा, कुछ प्यार तो करलें। 
रहेगी बात-किस्सा प्रेम का ,
समझो अमर होगा। 
वो गाते गीत गाएंगे ,
कि जैसे राम 'औ' सीता। 
नहीं हम कृष्ण ,
पर राधा का कुछ ,
अहसास तो करलें। 
बताओ राधा-कृष्णा की ,
अमर जो प्रेम की बातें। 
न कोई घात ,न प्रतिघात ,
बस उनमें प्रेम पलता है। 
वही तुमसे हमें-अपनी ,
कहानी को बनाना है। 
ये किस्सा है पुराना ,पर ,
ज़रा नज़दीक तो आना। 
वहां क्यों दूर से -
दाना पे दाना डालती क्यों हो ?
रिझाने में मज़ा ,
यह मानता ,
पर बात को समझो। 
      ज़रा खिलवन्त में आओ ,
      ज़रा दीदार तो कर लें। 






उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chnadra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...