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Sunday, April 23, 2017

तुम पर आस लगाए हैं - 2

poem by Umesh chandra srivastava

अब तो सुनवाई है होनी ,
क्यों भृकुटी है तनी हुई।


न्याय व्यवस्था को क्या कहना ,
न्याय व्यवस्था न्यायमयी।
यही देखना है बस आगे ,
क्या निर्णय ,क्या बात हुई।
वैसे तो यह मैटर ठहरा ,
इसपर लिखना दूभर है।
पर सत्य बताना वाजिब ,
सत्य आवरण में खिलता।
सत्यों का अनमोल जगत यह ,
यहां सत्य है सत्यासत्य।
मगर रौशनी में जो दिखता ,
उसमें कुछ परछाईं है।
परछन का यह दौर पुराना ,
परछन जग की थाती है।
इसीलिए इस पर  कुछ कहना ,
परछन का प्रतिघाती है।
लो अब समझो तुम तो ठहरे ,
भावों के खेलन-मेलन।
तुमसे कुछ भी कहना सुनना ,
भावों का भावातुर है।
कुशल चितेरक तुम भावों के ,
भाव-भावना से खेलो।
हम सब सारा सब कुछ सह के ,
तुम पर आस लगाए हैं।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
poem by Umesh chandra srivastava 

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