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Saturday, July 28, 2018

हक़ीक़त ज़िंदगानी है 'औ' बाकी आग-पानी है,

A poem of Umesh chandra srivastava

१. 
हक़ीक़त ज़िंदगानी है 'औ' बाकी आग-पानी है, 
वो पगली तो दीवानी है 'औ ' बाकी आग पानी है।
कसर कोई नहीं रह जाये , पूरी जिन्दगानी में ,
यह मौका फिर नहीं मिलता-यही जन की कहानी  है।

२.
शहर के हर तिराहे पे-मिलेंगे मनचले एैसे ,
कि जैसे फेकदानी से पकड़ लेंगे वह हर पंछी।
निगाहों में दीवानापन-यही उनकी निशानी है ,
बिदक कर बात वह करते-यही उनकी चिन्हानी है।

३.
तुम्हारे पास कुछ तो है ,  जहां से हम खींचे आते ,
बहुत पैबंद रखती हो - कहाँ से यह  हुनर सीखा।
बताओ इस अदा को हम-कहाँ , क्या नाम भी रक्खें,
उठाकर फेर लेती हो- यही उल्फत दीवानी है।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव - 
  A poem of Umesh chandra srivastava 

Friday, July 27, 2018

मुझको तो ज़माने से कहीं कोई गिला नहीं

A poem of umesh chandra srivastava

मुझको तो ज़माने से नहीं कोई है गिला ,
जो भी मिला उसी से बढ़ाया है सिलसिला।
कहने को मुकद्दर भी बड़ी चीज़ है मगर ,
तदबीर के बिना भी कभी कुछ नहीं मिला।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of umesh chandra srivastava 

Tuesday, July 24, 2018

मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए -2

A poem of Umesh chndra srivastava

देश प्रेम , मातृ प्रेम , सहोदरता बढ़े ,
ऐसा ही मुहीम चलाना चाहिए।
भक्ति-भाव , आस्था का पुंज बने वो ,
ऐसा ही मनुष्य बनाना चाहिए।

जगहित कार्य करे , स्वार्थ से परे ,
ढीली ढाली बात नहीं , नियम से चले।
बात-बात में उसकी शीरी वाणी हो ,
ऐसा ही मनुष्य बनाना चाहिए।

         मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए ,
          कोई कारखाना चलाना चाहिए।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chndra srivastava

Monday, July 23, 2018

मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए

A poem of Umesh chandra srivastava


मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए ,
कोई कारखाना चलाना चाहिए।
नट , बोल्ट , पेंच सब दुरुस्त हो जहाँ ,
बुद्धि 'औ' विवेक लगाना चाहिए।

जहां सदाचार , ईमान पाठ हो ,
सत्य , प्रेम दीपक जलाना चाहिए।
वहां पे मनुष्य जितने भी बने वो ,
सबमे  मिटाना चाहिए। (क्रमशः )





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

Thursday, June 28, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -20

A poem of Umesh chandra srivastava


मनु श्रद्धा हों , चाहे जो भी ,
आकर्षण से खिचे रहे।
तभी तो सृष्टि का कुसुमित पल ,
सहसा फिर से शुरू हुआ।

याद मुझे है प्रकृति तुम्हारा,
मोह रहा विपरीति लिंग।
परबस , प्रतिक्षण अर्पण करने -
को आतुर तुम सहज रहे।

अरे! उर्बी तुमको वह पल ,
याद रहा होगा , हर्षित हूँ।
तेरे ही कपोल सुंदरता का ,
मैं मोहित तब से ही रहा।

न जाने कब से तुम उर्बी ,
तरुणी जैसी बनी हुई।
मैं बिहसा , टूटा रहता था ,
तब भी तुम समभाव रही।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Tuesday, June 26, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -19

A poem of Umesh chandra srivastava


पर क्या उर्बी वह भोला तो ,
जीवन में पाना चाहता। 
शॉर्टकट में सबकुछ चाहिए ,
इसीलिए वह ठग जाता। 

उसमें नारी प्रेम है इतना ,
नारी के प्रति असीम लगाव। 
इसी के चलते निज भावों को  ,
नहीं संतुलित रख पता।

वह तो प्रकृति तुम्हारे जैसा ,
पल-पल हमे सताता है।
जल प्रपात हो , झंझा चाहे ,
सब तो मैं ही शती हूँ।

याद करो प्रकृति , प्रलय का ,
भीषण गहराया पल था।
सभी जीव-जंतु नष्ट हुए थे ,
तब भी मैं संतुलित रही।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Wednesday, June 13, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -18

A poem of Umesh chandra srivastava


गर-वह प्रकृति तुम्हारे जैसा ,
निज जीवन व्यवहार करे।
तब तो दुःख की रजनी उसको ,
कभी नहीं आगोश में ले।

वह संतुलित नहीं रह पाता ,
चाहे जो भी कारण हो।
पल-पल में वह नयन दृगों से ,
बह्ताया रहता स्रोता।

उस अकिंचन पर दृण , करुणा ,
पर वह विचलित भी होता।
पल-पल में संतुलित भी होता ,
पल-पल में हँसता-रोता।

गर वह अपने निज भावों से ,
अपने को संतुलित करे।
उसके जैसा कोई प्राणी ,
जग में दूजा न होगा।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Sunday, June 10, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -17

A poem of Umesh Chandra Srivastava


उसके भाव सरल होते हैं ,
स्मृतियाँ भी समतल हैं।
कहाँ हवा में उड़ आता वह ,
भावों का अटखेलक वह।

उसे भाव में बहने दो सखि ,
वह भावों का कुशल चितेरक।
किस्सा-विस्सा बुनने दो बस ,
कहने दो 'औ' लिखने दो।

उसकी दृष्टि अनोखी अद्भुत ,
बहुत सी बातें कह-सुनता।
जो भी हम जाने 'औ' समझें ,
उससे पूर्व वह लिख देता।

सुंदरता की दृष्टि प्रबल है ,
सुंदरता की वह प्रतिमूर्ति।
क्यों न हो ऐसा वह प्यारे ,
वह हम दोनों की संतति है। 



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Friday, June 8, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -16

A poem of Umesh  Chandra Srivastava



विश्लेषण करना हो , चाहो-
अलग-अलग सब कर लो भी।
मगर सत्य है हम दोनों ही ,
दोनों में समरूप रहे।

मैं उर्बी हूँ , तुम प्रकृति हो ,
मैं नारी , तुम पुरुष रहो।
तेरा मेरा मिलना होता ,
जगती को सुख देने को।

नाहक लोग प्रपंची होते ,
कहते-रहते है सुख-दुःख।
हम दोनों सहते यह सब हैं ,
पर कहते क्या , चुप रहते ?

सखे मनुज है दुर्बल प्राणी ,
जरा-जरा में हंस रोता।
जीवन की सारी संगतियाँ ,
कहाँ-कहाँ वह नहीं ढोता।





उमेश चंद्र श्रीवास्तव -

Wednesday, June 6, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -15

A poem of Umesh chandra srivastava


उसको क्या-क्या बात कहूँ मैं ,
जिसने तेरा सृजन किया।
जीवन का अनमोल रहस्य तू ,
सदा-सदा तू तरुणी लगती।

बहुत हो गया मेरा वर्णन ,
तुमसे प्यारे ही हम हैं।
गर तुम रहे तभी तो-
मेरा जीवन-जीवन है।

तुमसे ही तो हरियाली है ,
तुमसे ही खिलना मेरा।
बिन तेरे हम कुछ भी नहीं हैं ,
तुमसे ही होना मेरा।

तेरा अर्पण , तेरा समर्पण  ,
जबसे हम तुम बने हुए।
मैं तुझमें हूँ , तू मुझमे है ,
प्यारे हम दो एक ही हैं।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव  -
A poem of Umesh chandra srivastava 

Saturday, June 2, 2018

‘प्रकृति’ कविता संग्रह से -14

A poem of Umesh chandra srivastava 

तू वसुधा अनमोल रतन है ,
देवों का तू गर्वित क्षण। 
वार-वार सब कुछ तेरे में ,
तेरा स्वागत प्रतिपल प्रतिक्षण। 

स्नेहिल , पुष्पित , हर्षित हो ,
नित्य तुम्हारा रूप निखरता। 
अन्दर बाहर दोनों सुन्दर ,
क्या उपमा , सब उपमा विगलित। 

रोज तुम्हारा दर्शन-वर्शन ,
खिली-खिली मोहक लगती। 
पानी , आंधी , तूफां सहकर ,
सुखद सलोनी फिर भी लगती। 

नारी रूप बड़ा मोहक है ,
नर सब देख रसिक बस होते। 
टक-टक देखें , नख-सिख तब तक ,
जब टक दृष्टि नहीं थकती। 




उमेश चन्द्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

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