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Thursday, January 4, 2018

मुट्ठीभर कुछ लोग आये हैं

A poem of Umesh chandra srivastava

मुट्ठीभर कुछ लोग आये हैं ,
तंत्र-मन्त्र को रचने खातिर।
यह भारत है, देश है भाई ,
भाईचारा यहाँ अमिट है।
दे दो चाहे जितनी दुहाई ,
नहीं राग यह खोने वाला।
विश्व पटल पर भारत नक्शा ,
सदा-सदा ही खिलने वाला।
यह तो याद रखो मेरे बंधु ,
भारत विश्व का दर्पण है।
चारों जन ही सुखद यहाँ हैं ,
यही हमारा अर्पण है।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 



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