month vise

Sunday, January 7, 2018

एक मुक्तक

A poem of Umesh chandra srivastava

धूप खिली है ,मैं बैठा हूँ - कैसा लगता हूँ ,
रात सिली है , मैं जगता हूँ -कैसा लगता हूँ।
दुनिया की सब गच्च-मच्च में जीवन बीता है ,
अब तो राम से नैन लड़ी है-कैसा लगता हूँ।



उमेश चंद्र श्रीवास्तव- 
A poem of Umesh chandra srivastava 

No comments:

Post a Comment

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...