month vise

Saturday, January 6, 2018

रोटी का समाजशास्त्र

A poem of Umesh chandra srivastava 

रोटी का समाजशास्त्र ,
व्यापक हो रहा ,
हर व्यक्ति ,
इसके भूगोल की पड़ताल में ,
दिख रहा। 
अब दो रोटी नहीं ,
जिससे पेट तर हो। 
अब भूख का भूगोल ,
समझना पड़ेगा। 
पृथ्वी की ही तरह ,
विज्ञान वेत्ताओं को -
खगालना पड़ेगा ,
कि इसकी व्यापकता क्या है ?
यह भूख इतनी व्यापक ,
क्यों हो रही है ,
कि पेट ही नहीं भरता। 
आदमी तरता रहता ,
सम्पूर्ण जीवन-
इसी की भक्की में ,
लेकिन भर नहीं पाता इसे। 



 उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava 

No comments:

Post a Comment

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...