month vise

Sunday, August 19, 2018

तू है अनंत

A poem of Umesh chandra srivastavca



तू है अनंत ,
सब दिग दिगन्त।
हर कण-कण में ,
तेरा वसंत।

सारे पर्वत ,
सारी नदियां  ,
हर रूप स्वरुप में ,
तू अनंत।

कर्मों की बेल ,
अमर तू है।
गीता-पुराण  ,
उपनिषद , ग्रथ।
तू राम-श्याम ,
तू राधा है।
कैलाश शिखर ,
कल्याण धाम ,
सब जगह ही ,
तेरा है वसंत।




उमेश चंद्र श्रीवास्तव-
A poem of Umesh chandra srivastavca 

No comments:

Post a Comment

काव्य रस का मैं पुरुष हूँ

A poem of Umesh Srivastava काव्य रस का मैं पुरुष हूँ गीत गाने आ गया | खो रही जो बात मैं उसको बताने आ गया | रात चंदा ने चकोरी से कहा तुम जान ...