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Wednesday, August 22, 2018

मृत्यु आये तो तरसकर

A poem of Umesh chandra srivastava

मृत्यु आये तो तरसकर ,
मुझपे न उपकार करना।
कर्म जो नर ने किया है ,
उसको ही स्वीकार करना।

यह जगत है सर्जना का ,
सृजन में सब अणु जुटे।
टूट फूटन का यहाँ पर ,
ना कोई अधिभार रखना।

वह जलज का अंश केवल ,
बुलबुला तिर ठोस बनता।
प्राण वायु के भ्रमण से ,
वह सदा अनमोल तनता।

गहन गोचर मार्ग पथ पर ,
कर्म की बेली से चढ़ना।
वरना टूटोगे तुम ऐसे ,
वेदना का रस है खलना।

यह छलाछल काल ठहरा ,
सब प्रपंची जुट गए हैं।
मोह के अविराम पल में ,
सब ससंची लुट गए हैं।

तुम यहां रसधार लेकर ,
कृष्ण की माया को देखो।
वह अकेला इस जगत में ,
राम की बातों को छोड़ो।

            कृष्ण से अनुराग करना ,
            राम पर बस बात करना।
            मृत्यु आये तो तरसकर ,
            मुझपे न उपकार करना।











उमेश चंद्र श्रीवास्तव -
A poem of Umesh chandra srivastava

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