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Sunday, April 9, 2017

ये दर्पण रीझाता सुझाता है मुझको

poem by Umesh chandra srivastava

ये दर्पण रीझाता सुझाता है मुझको ,
बहुत दांव-पेंच सिखाता है मुझको।
मगर ये जो झुर्री नज़र आ रही है ,
उमर हो गयी है बताता है मुझको।

मगर वो सनम क्या सुहाने से दिन थे ,
लगा के जो आती थी पहलू में मेरे।
नज़ारे सभी बौने अब हो गए हैं ,
मगर अब भी सुधियों की  चादर है उड़ती।

सुबकता बुलाता नहीं तुम अब आती ,
वो दर्पण भी फोटो दिखाता ही रहता।
बहुत मान से यह बताता ही रहता ,
रहो याद करके मगर कुछ न बोलो।

ह्रदय के पटों को मलो और तौलो ,
नहीं मिल सकेगी सकीना यहाँ अब।
नगीना बनी अब तो मौसम फ़िज़ा में ,
उसे बस निहारो-तुम सपनों की चादर।

यही ज़िन्दगी है सम्भालो ज़रा तुम ,
इसी से तो बेबस वशर हो गया है।
कहें क्या किसी से नज़र हो गया है ,
बस ऐसे बिताओ जो जीवन बचा है।

लगाओ मनों को बहुत से जो मंजर ,
सुधी में रामों बस उसे याद रख्खो।
खुदा का दिया सब यहाँ पर मिला है ,
सिला है ,खिला है यहाँ बस मिला है।


उमेश चंद्र श्रीवास्तव-
poem by Umesh chandra srivastava 

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